Table of content:
1. कवि कबीर दास का जीवन परिचय 
2. अरे इन दोहन राह ना पाई पद का भावार्थ 
3. बालम, आवो हमारे गेह रे पद का भावार्थ 
4. कबीर के पद कविता प्रश्न अभ्यास 
5. क्लास 11 अंतरा भाग 1 सभी कविताएं

Kabir Das Ke Pad Class 11 Hindi Antra Chapter 10 Summary

संत कबीर दास का जीवन परिचय- Kabir Das Ka Jivan Parichay:

कबीर प्राचीन भारत के सबसे प्रसिद्ध कवियों की सूची में सबसे प्रथम स्थान पर है। उनका जन्म (kabir das ka janm) वाराणसी में हुआ हाँलाकि इस बात की पुष्टि नही की जा सकती परन्तु ऐसा माना जाता है कि जन्म सन् 1400 के आसपास हुआ।

उनके माता-पिता के बारे में भी यह प्रमाणित नहीं है कि उन्होने कबीरदास को जन्म दिया या केवल उनका पालन-पोषण किया। कबीर ने खुद को अपनी कई रचनाओ में जुलाहा कहा है। उन्होने कभी विधिवत शिक्षा नही प्राप्त की किन्तु ज्ञानी और सन्तो के साथ रहकर कबीर ने दीक्षा और ज्ञान प्राप्त किया।

वह धार्मिक कर्मकांड़ो से परे थे उनका मानना था की परमात्मा एक है इसलिए वह हर धर्म की आलोचना और प्रशंसा करते थे। उन्होने कई कविताए गाई जो आज के सामाजिक परिद्रश्य में भी उतनी ही सटीक है जितनी उस समय। उन्होने अपने अतिंम क्षण मगहर में व्यतीत किए और वही अपने प्राण त्याग किए।

Kabir Das Ki Rachnaye कबीर ग्रंथावली में संग्रहीत है। कबीर की कई रचनाए गुरुग्रंथ साहिब में भी पढ़ी जा सकती है।

कबीर के पद अर्थ सहित – Kabir Das Ke Pad in Hindi With Meaning Class 11
Kabir Ke Pad

अरे इन दोहुन राह न पाई।
हिन्दू अपनी करे बड़ाई गागर छूवन न देई।
बेस्या के पायन-तर सोवै यह देखो हिंदुआई।
मुसलमान के पीर-औलिया मुर्गी-मुर्गा खाई।
खाला केरी बेटी ब्याहै घरहिं में करै सगाई।
बाहर से एक मुर्दा लाए धोय-धाय चढ़वाई।
सब सखियाँ मिलि जेंवन बैठीं घर-भर करै बड़ाई।
हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई।
कहैं कबीर सुनों भाई साधो कौन राह हैं जाई।।

कबीर के पद अर्थ सहित : यह कविता प्राचीन भारत की वर्णीक और धार्मिक व्यवस्था पर आघात है इस कविता में कवि कुछ द्रष्टांतो के उदाहरण से उस समय कि सामाजिक प्रणाली को दर्शाता है और दूसरी ओर अपनी दुविधा भी प्रकट करता है कि वह किस मार्ग पर जाए। कविता में दो धर्मो की के बारे में बात की गई है।

कविता की पहली पंक्ति में ही कवि कहता है की ये दोनो ही रास्ता भटक गए है यहा दोनो से तात्पर्य है हिन्दु और मुसलमान और राह का तात्पर्य है धार्मिक पंथो से, जैसे हिन्दु बहुत बड़ा बनता है और अपना पानी तक मुस्लिम को छूने नही देता लेकिन रात को वैश्या के पैरो में सोता है।

वैसे ही मुसलमान जिनके ईष्ट ही मांस का सेवन करते है और ये अपनी कन्या अपने ही घर ब्याहते है।

कविता में कवि कहता है की उसने हिंदुओ को बड़प्पन और मुसलमानो की ऊँचाई देखी परन्तु उसे कुछ नही भाया।

हिन्दू और मुस्लिम समाज में अत्यधिक भेद भाव था। जहाँ ब्राह्मण स्वयं को पवित्र एवं श्रेष्ठ मानने में गर्व महसूस करते थे वहीं मुसलमान भी स्वयं को अपने धर्म के प्रति अत्यंत कट्टर और शक्तिशाली समझते थे।

एक ओर जहाँ हिंदू मुसलमानों को म्लेच्छ समझते थे तो मुसलमान उन्हें काफिर मानते थे। दोनों ही अपने धर्म की रुढियों और अपनी परम्पराओं का अंधानुसरण करने में एक दुसरे से बढ़ कर थे।

कबीर ने अपने इस काव्य में सामाजिक भेद-भाव का तीव्र विरोध किया है और हिन्दू-मुस्लिम दोनों को खरी- खोटी सुनाई, जहाँ एक ओर हिन्दुओं को फटकारा वहीँ दूसरी ओर मुसलमानों पर भी करारी चोट की।

बालम, आवो हमारे गेह रे।
तुम बिन दुखिया देह रे।
सब कोई कहै तुम्हारी नारी, मोकों लगत लाज रे।
दिल से नहीं लगाया, तब लग कैसा सनेह रे।
अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे।
कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे।
है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिवासों कहै सुनाय रे।
अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे।।

कबीर के पद अर्थ सहित :  कबीर के पद में कबीर ने एक बिरहन के दर्द की व्याख्या की है वह अपने बालम के आने कि राह देख रही है और लोगो से कहती फिर रही है की कोई उसके साजन को बताए कि वह उनके दर्शन के लिए कितनी व्याकुल है।

इन पंक्तियो को दांपत्य जीवन के इर्द-गिर्द बुना गया है जहा पति अपना कर्तव्य निभाने और अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए धन कमाने घर से दूर चला गया है और कई दिनो के पश्चात भी घर नही लौटा है।

यह कविता बिरह की पी़ड़ को दर्शाती हैं, एक बिरहिन अपने बालम से आग्रह कर रही है की अब वह और देर न करे अपने दर्शन देने में लोगो के ताने अब उससे सहे नही जाते। उसे न तो अब भूख लगती है और नाही प्यास।

वह अपने स्वामी के लिए उतनी ही व्याकुल है जितना कोई प्यासा पानी के लिए। वह लोगो से आग्रह कर रही है कि कोई जाकर उसके प्रियवर को यह ख़बर दे कि बिना प्राणनाथ के दर्शन के उसके प्राण उसकी देह छोड़ रहे है।

यह (देह) इतनी अधिक उदासीन हो गई है कि इसे अब इस बात का डर लगने लगा है कि प्रियतम इसे प्रेम करते भी है या नही, अब इसे खुद पर संदेह होने लगा है और यह जैसे जैसे ये बात सोचती है इसकि व्याकुलता बढ़ती जाती है।

क्लास 11 अंतरा भाग 1- Class 11 Hindi Antra Part 1 All Chapter

10. कबीर के पद- कबीर
11. सूरदास के पद- सूरदास
12. हँसी की चोट – देव
13. औरै भाँति- पद्माकर
14. संध्या के बाद- सुमरित्रानन्दन पंत
15. जाग तुझको दूर- महादेवी वर्मा
15. सब आँखों के आँसू उजले
16. नींद उचट जाती है- नरेंद्र शर्मा
17. बादल को घिरते देखा है- नागार्जुन
18. हस्तक्षेप- श्रीकांत वर्मा
19. घर में वापसी- धूमिल

Tags :

  • kabir das ke pad in hindi with meaning
  • kabir das ke pad in hindi
  • kabir ke pad hindi me
  • kabir ke pad in hindi
  • kabir ke pad
  • kabir ke pad in hindi with meaning
  • kabir das ka janm
  • kabir saheb ki photo
  • kabir das ka photo
  • kabir das ke guru ka naam
  • picture of kabir das
  • kabir ka janam
  • kabir das ke pad