Table of content:
1. कवी सुमित्रानन्दन पंत का जीवन परिचय 
2. संध्या के बाद कविता का सारांश
3. संध्या के बाद कविता
4. संध्या के बाद कविता की व्याख्या 
5. संध्या के बाद कविता प्रश्न अभ्यास
6. क्लास 11 अंतरा भाग 1 सभी कविताएं

Sandhya Ke Baad Class 11 Hindi Antra Chapter 14 Summary

सुमित्रानन्दन पंत का जीवन परिचय :

👉 छायावादी काव्यधारा के महान कवि सुमित्रानंदन पंत  का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के कौसानी गांव में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी में हुई तथा उच्च शिक्षा इलाहाबाद के ‘म्योर कॉलेज’ में हुई।

      पंत जी ने ‘लोकायतन’ संस्था की स्थापना की। ये लंबे समय तक आकाशवाणी के परामर्शदाता रहें। 28 दिसम्बर 1977 में इनका निधन हो गया।

सुमित्रानन्दन पंत की रचनाएं व सम्मान:-

👉 ‘वीणा’, ‘पल्लव’, ‘युगवाणी’, ‘ग्राम्या’, ‘ग्रंथि’, ‘स्वर्नकिरण’, ‘गुंजन’ एवं ‘उत्तरा’।

साहित्य अकादमी पुरस्कार (1960 कला व बूढ़ा चांद) ज्ञानपीठ पुरस्कार (1969 चिदम्बरा) पाने वाले हिन्दी के प्रथम कवि हैं।

पद्मभूषण (1961) सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार।

सुमित्रानन्दन पंत की काव्यगत विशेषताएं:-

  1. सुमित्रानंदन पंत की आरंभिक कविताओं में प्रकृति प्रेम एवं रहस्यवाद झलकता है। इसके बाद के चरण की कविताएं मार्क्स व गांधी से प्रभावित है अगले चरण की कविताओं पर अरविंद दर्शन का प्रभाव नजर आता है।
  2. पंत जी प्रकृति के चितेरे (चित्रकार) कवि है।
  3. प्रकृति के काल रूप का चित्रण एवं उसके पल-पल के परिवर्तनशील सौंदर्य का चित्रात्मक वर्णन इनकी विशेषता है।

सुमित्रानन्दन पंत की भाषा-शैली:-

  1. तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है।
  2. मानवीकरण, विशेषण-विप्रयय एवं धवन्यार्थ व्यंजना जैसे नवीन अलंकारों के साथ उपमा, रूपक एवं उत्प्रेक्षा जैसे परम्परागत अलंकारों का प्रयोग।
  3. अमृत के माध्यम से मूर्त का वर्णन उनकी प्रमुख विशेषता है।

Sandhya ke baad summary in Hindi – संध्या के बाद कविता का सारांश 

👉 प्रस्तुत कविता छायावाद के प्रमुख आधार स्तंभ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित ‘ग्राम्या’ में संकलित है।

      कविता में संध्या के समय होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों, ग्रामीण जीवन के दैनिक किर्याकलापों के वर्णन के साथ-साथ मानवता एवं संवेदनशीलता का भी संदेश दिया है कवि ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की आश्यकता पर बल दिया है।

जो शोषणमुक्त हो, जिसमें दरिद्रता न हो एवं कर्म तथा गुणों के आधार पर साधनों व अर्थ की प्रप्ति हो, गावन दरिद्रता, उत्पीड़न एवं निराशा व्याप्त है। परंतु व्यक्ति इनको प्रकट करने में असमर्थ है। कवि ने समस्त पापों का कारण दरिद्रता को माना है। दरिद्रता के लिए कोई व्यक्ति-विशेष दोषी नहीं है। बल्कि सामाजिक व्यवस्था दोषी है।

      गांव के बनिए के माध्यम से कवि कहना चाहता है की व्यक्ति अपनी कथनी और कहनी में समानता द्वारा सामाजिक व्यवस्था में तभी परिवर्तन का सकता है। जब व्यक्ति की सोच और आचरण समान है।

संध्या के बाद कविता – Sandhya ke baad kavita 

सिमटा पंख साँझ की लाली
जा बैठी तरू अब शिखरों पर
ताम्रपर्ण पीपल से, शतमुख
झरते चंचल स्‍वर्णिम निझर!
ज्‍योति स्‍तंभ-सा धँस सरिता में
सूर्य क्षितिज पर होता ओझल
बृहद जिह्म ओझल केंचुल-सा
लगता चितकबरा गंगाजल!
धूपछाँह के रंग की रेती
अनिल ऊर्मियों से सर्पांकित
नील लहरियों में लोरित
पीला जल रजत जलद से बिंबित!
सिकता, सलिल, समीर सदा से,
स्‍नेह पाश में बँधे समुज्‍ज्‍वल,
अनिल पिघलकर सलि‍ल, सलिल
ज्‍यों गति द्रव खो बन गया लवोपल!

शंख घट बज गया मंदिर में
लहरों में होता कंपन,
दीप शीखा-सा ज्‍वलित कलश
नभ में उठकर करता निराजन!
तट पर बगुलों-सी वृद्धाएँ
विधवाएँ जप ध्‍यान में मगन,
मंथर धारा में बहता
जिनका अदृश्‍य, गति अंतर-रोदन!
दूर तमस रेखाओं सी,
उड़ती पंखों सी-गति चित्रित
सोन खगों की पाँति
आर्द्र ध्‍वनि से निरव नभ करती मुखरित!
स्‍वर्ण चूर्ण-सी उड़ती गोरज
किरणों की बादल-सी जलकर,
सनन तीर-सा जाता नभ में
ज्‍योतित पंखों कंठों का स्‍वर!

लौटे खग, गायें घर लौटीं
लौटे कृषक श्रांत श्‍लथ डग धर
छिपे गृह में म्‍लान चराचर
छाया भी हो गई अगोचर!
लौट पैंठ से व्‍यापारी भी
जाते घर, उस पार नाव पर,
ऊँटों, घोड़ों के संग बैठे
ख़ाली बोरों पर, हुक्‍का भर!
जोड़ों की सुनी द्वभा में,
झूल रही निशि छाया छाया गहरी,
डूब रहे निष्‍प्रभ विषाद में
खेत, बाग, गृह, तरू, तट लहरी!
बिरहा गाते गाड़ी वाले,
भूँक-भूँकर लड़ते कूकर,
हुआँ-हुआँ करते सियार,
देते विषण्‍ण निशि बेला को स्‍वर!

माली की मँड़इ से उठ,
नभ के नीचे नभ-सी धूमाली
मंद पवन में तिरती
नीली रेशम की-सी हलकी जाली!
बत्‍ती जल दुकानों में
बैठे सब कस्‍बे के व्‍यापारी,
मौन मंद आभा में
हिम की ऊँध रही लंबी अधियारी!
धुआँ अधिक देती है
टिन की ढबरी, कम करती उजियाली,
मन से कढ़ अवसाद श्रांति
आँखों के आगे बुनती जाला!
छोटी-सी बस्‍ती के भीतर
लेन-देन के थोथे सपने
दीपक के मंडल में मिलकर
मँडराते घिर सुख-दुख अपने!

कँप-कँप उठते लौ के संग
कातर उर क्रंदन, मूक निराशा,
क्षीण ज्‍योति ने चुपके ज्‍यों
गोपन मन को दे दी हो भाषा!
लीन हो गई क्षण में बस्‍ती,
मिली खपरे के घर आँगन,
भूल गए लाला अपनी सुधी,
भूल गया सब ब्‍याज, मूलधन!
सकूची-सी परचून किराने की ढेरी
लग रही ही तुच्‍छतर,
इस नीरव प्रदोष में आकुल
उमड़ रहा अंतर जग बाहर!
अनुभव करता लाला का मन,
छोटी हस्‍ती का सस्‍तापन,
जाग उठा उसमें मानव,
औ’ असफल जीवन का उत्‍पीड़न!

दैन्‍य दु:ख अपमान ग्‍लानि
चिर क्षुधित पिपासा, मृत अभिलाषा,
बिना आय की क्‍लांति बनी रही
उसके जीवन की परिभाषा!
जड़ अनाज के ढेर सदृश ही
वह दीन-भर बैठा गद्दी पर
बात-बात पर झूठ बोलता
कौड़ी-सी स्‍पर्धा में मर-मर!
फिर भी क्‍या कुटुंब पलता है?
रहते स्‍वच्‍छ सुधर सब परिजन?
बना पा रहा वह पक्‍का घर?
मन में सुख है? जुटता है धन?
खिसक गई कंधों में कथड़ी
ठिठुर रहा अब सर्दी से तन,
सोच रहा बस्‍ती का बनिया
घोर विवशता का कारण!

शहरी बनियों-सा वह भी उठ
क्‍यों बन जाता नहीं महाजन?
रोक दिए हैं किसने उसकी
जीवन उन्‍नति के सब साधन?
यह क्‍यों संभव नहीं
व्‍यवस्‍था में जग की कुछ हो परिवर्तन?
कर्म और गुण के समान ही
सकल आय-व्‍यय का हो वितरण?
घुसे घरौंदे में मिट्टी के
अपनी-अपनी सोच रहे जन,
क्‍या ऐसा कुछ नहीं,
फूँक दे जो सबमें सामूहिक जीवन?
मिलकर जन निर्माण करे जग,
मिलकर भोग जीवन करे जीवन का,
जन विमुक्‍त हो जन-शोषण से,
हो समाज अधिकारी धन का?

दरिद्रता पापों की जननी,
मिटे जनों के पाप, ताप, भय,
सुंदर हो अधिवास, वसन, तन,
पशु पर मानव की हो जय?
वक्ति नहीं, जग की परिपाटी
दोषी जन के दु:ख क्‍लेश की
जन का श्रम जन में बँट जाए,
प्रजा सुखी हो देश देश की!
टूट गया वह स्‍वप्‍न वणिक का,
आई जब बुढि़या बेचारी,
आध-पाव आटा लेने
लो, लाला ने फिर डंडी मारी!
चीख उठा घुघ्‍घू डालों में
लोगों ने पट दिए द्वार पर,
निगल रहा बस्‍ती को धीरे,
गाढ़ अलस निद्रा का अजगर!

Sandhya ke baad explanation in Hindi – संध्या के बाद कविता की व्याख्या 

सिमटा पंख साँझ की लाली
जा बैठी तरू अब शिखरों पर
ताम्रपर्ण पीपल से, शतमुख
झरते चंचल स्‍वर्णिम निझर!
ज्‍योति स्‍तंभ-सा धँस सरिता में
सूर्य क्षितिज पर होता ओझल
बृहद जिह्म ओझल केंचुल-सा
लगता चितकबरा गंगाजल!
धूपछाँह के रंग की रेती
अनिल ऊर्मियों से सर्पांकित
नील लहरियों में लोरित
पीला जल रजत जलद से बिंबित!
सिकता, सलिल, समीर सदा से,
स्‍नेह पाश में बँधे समुज्‍ज्‍वल,
अनिल पिघलकर सलि‍ल, सलिल
ज्‍यों गति द्रव खो बन गया लवोपल!

संध्या के बाद कविता का अर्थ: कवि ने संध्या को पक्षी माना है। संध्या रूपी पक्षी अपने पंखों को समेटकर पेड़ की सबसे ऊंची शाखाओं में बैठता है। अतः संध्या की लालिमा जब पेड़ की उपरी शाखाओं पर दिख रही है।

तांबे के समान पीपल के पत्तों की तरह कई मुंह वाले चंचल झरने सुनहरी धाराओं में बह रहे है। इनके जल पर पीला प्रकाश पड़ रहा है जिससे वे तांबे के रंग का दिखाई दे रहा है। दूर क्षितिज पर उतरता सूर्य नदी में एक स्तम्भ के समान दिखाई दे रहा है।

गंगा का चिटकबरा पानी ऐसा लगता है, जैसे कोई बड़ा थका अजगर लेता हुआ हो। संध्या की लालीमा में नदी तट की रेती धूप-छांव रंग की है। वह हवा के बहने पर सायं का रूप ले लेती है। नदी के नीले जल की लहरों पर सूर्य का प्रतिबिंब पड़कर उसे पीला बना देता है तथा उस पर बादलों की सफेदी रजत जैसी दिखती है।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे हवा पिघलकर पानी बनता है तथा पानी अपनी गति तथा तरल रूप को खोकर ओले के रूप में ढल जाता है। इस तरह प्रकृति में बदलाव होते रहता है।

शंख घट बज गया मंदिर में
लहरों में होता कंपन,
दीप शीखा-सा ज्‍वलित कलश
नभ में उठकर करता निराजन!
तट पर बगुलों-सी वृद्धाएँ
विधवाएँ जप ध्‍यान में मगन,
मंथर धारा में बहता
जिनका अदृश्‍य, गति अंतर-रोदन!
दूर तमस रेखाओं सी,
उड़ती पंखों सी-गति चित्रित
सोन खगों की पाँति
आर्द्र ध्‍वनि से निरव नभ करती मुखरित!
स्‍वर्ण चूर्ण-सी उड़ती गोरज
किरणों की बादल-सी जलकर,
सनन तीर-सा जाता नभ में
ज्‍योतित पंखों कंठों का स्‍वर!

संध्या के बाद कविता का अर्थ: शाम के समय मंदिरों में आरती होने की तैयारी शुरू हो जाती है। शंख और घंटे बजने लगते है, जिससे नदी की लहरों में कम्पन होने लगता है। दीपक की लौ के समान कलश भी सूर्य की लालीमा में आकाश में ऊपर उठकर आरती करता दिखाई पड़ता है।

नदी के तट पर वृद्ध औरते बगुले के समान लगती है। सफेद कपड़ों में बगुले कि सी लगती है। जैसे उनके मन की पीड़ा नदी में समा जाती है। उनका दुख जैसे कोई समझ नहीं पाता।

आकाश में दूर जब पक्षी उड़ रहे होते है तो वे पंक्ति में अहंकार सा प्रतीत होता है। उनके गुंजन से सारे आकाश में चहचहाट हो जाती है। शाम को जब गाय वापस आती है तो उनके खुरों से धूल भी उड़ रही होती है यह धूल सूर्य-प्रकाश से सुनहरी हो जाती है।

जब आकाश में पंक्षियो के कंठ का सन् सन् करता तेज़ स्वर गूंजता है तो वह आकाश में तीर की तरह सन्न् से निकल जाता है।

लौटे खग, गायें घर लौटीं
लौटे कृषक श्रांत श्‍लथ डग धर
छिपे गृह में म्‍लान चराचर
छाया भी हो गई अगोचर!
लौट पैंठ से व्‍यापारी भी
जाते घर, उस पार नाव पर,
ऊँटों, घोड़ों के संग बैठे
ख़ाली बोरों पर, हुक्‍का भर!
जोड़ों की सुनी द्वभा में,
झूल रही निशि छाया छाया गहरी,
डूब रहे निष्‍प्रभ विषाद में
खेत, बाग, गृह, तरू, तट लहरी!
बिरहा गाते गाड़ी वाले,
भूँक-भूँकर लड़ते कूकर,
हुआँ-हुआँ करते सियार,
देते विषण्‍ण निशि बेला को स्‍वर!

संध्या के बाद कविता का अर्थ: शाम के समय पक्षी और गाएं अपने घरों को लौट रहे है। किसान भी सारा दिन मेहनत करके थके हुए घरों को लौट रहे है। सभी जीव अपने अपने रहने के स्थानों में जा छिपे है। अब तो अंधेरे के कारण पक्षियों कि छाया भी नहीं दिख रही है।

गांव के बाज़ार से व्यपारी भी अपने घर नाव में बैठकर लौट आए है। वे उंट, घोड़ों के साथ खाली बोरो में बैठकर हुक्का पी रहे है।

सदियों में शाम और रात के मिलने पर चारों ओर सूनापन है। संध्या बीत जाने पर रात कि छाया गहराती जा रही है। इस अंधकार में खेत, बाग, घर, पेड़, तट और लहरों की चमक भी डूबती जा रही है।

माली की मँड़इ से उठ,
नभ के नीचे नभ-सी धूमाली
मंद पवन में तिरती
नीली रेशम की-सी हलकी जाली!
बत्‍ती जल दुकानों में
बैठे सब कस्‍बे के व्‍यापारी,
मौन मंद आभा में
हिम की ऊँध रही लंबी अधियारी!
धुआँ अधिक देती है
टिन की ढबरी, कम करती उजियाली,
मन से कढ़ अवसाद श्रांति
आँखों के आगे बुनती जाला!
छोटी-सी बस्‍ती के भीतर
लेन-देन के थोथे सपने
दीपक के मंडल में मिलकर
मँडराते घिर सुख-दुख अपने!

संध्या के बाद कविता का अर्थ: शाम होते ही गांव के मली के घर से धुआं-सा उठने लगता है जो आकाश जैसा दिखने लगता है। वह धुएं की पंक्ति हवा में ऎसे तैरती प्रतीत होती है नीले रेशम की हल्की जाली हो। इसी समय में गांव-कस्बे का दुकानदार रोशनी के लिए बत्ती जला देते है।

इस मूक प्रकाश की चमक में सर्दी की रात बर्फ से उघंती सी प्रतीत होती है। यहां दिन की डिबरी में बत्ती लगाकर जलाई जाती है जो रोशनी तो बहुत कम देती है, पर दुआं अधिक देती है।

मन का दुख, आंखों से निकलकर जला भुनता सा प्रतीत होता है। गांव का दुकानदार परेशान रहता है। वह एक छोटी सी बस्ती है। इसमें लेन-देन की बातें बेकार है। यहां ग्राहक ना के बराबर है, आय भी बहुत कम है। दीपक की लौ के मंडल के अास-पास ही सुख-दुख के सपने मंडराते रहते है।

कँप-कँप उठते लौ के संग
कातर उर क्रंदन, मूक निराशा,
क्षीण ज्‍योति ने चुपके ज्‍यों
गोपन मन को दे दी हो भाषा!
लीन हो गई क्षण में बस्‍ती,
मिली खपरे के घर आँगन,
भूल गए लाला अपनी सुधी,
भूल गया सब ब्‍याज, मूलधन!
सकूची-सी परचून किराने की ढेरी
लग रही ही तुच्‍छतर,
इस नीरव प्रदोष में आकुल
उमड़ रहा अंतर जग बाहर!
अनुभव करता लाला का मन,
छोटी हस्‍ती का सस्‍तापन,
जाग उठा उसमें मानव,
औ’ असफल जीवन का उत्‍पीड़न!

संध्या के बाद कविता का अर्थ: कवि कहता है गांव में निर्धनता का राज है। इसीलिए कांपती लो के साथ-साथ उनके हृदय में कम्पन होता है। उनकी मूक निराशा की भावना कम प्रकाश में प्रकट होती है। इस समय जो हल्का प्रकाश हो रहा है।

वहीं उनके मन में सामयी गुप्त बातों को प्रकट करता सा जान पड़ता है। उनके मिट्टी के कच्चे घर-आंगन सब अंधकार में विलीन हो जाते है। इस निराशा भरे वातावरण में गांव का छोटा सा दुकानदार अपनी याद तक भूल जाता है।

वह मूलधन और ब्याज का हिसाब लगाना भी भूल जाता है। उसकी परचून कि दुकान सिमटी-सी है। उसमें परचून का सामान भी बहुत कम है।

वह उसे बहुत छोटी लग रही है। इस मूक अंधकार के वातावरण में उसके मन का दुख उमड़ रहा है। इस समय गांव की दुकान का लाला अपने छोटे ओहदे के कारण अपने अंदर हीन भावना का अनुभव करता है। वह बेचैन हो जाता है।

दैन्‍य दु:ख अपमान ग्‍लानि
चिर क्षुधित पिपासा, मृत अभिलाषा,
बिना आय की क्‍लांति बनी रही
उसके जीवन की परिभाषा!
जड़ अनाज के ढेर सदृश ही
वह दीन-भर बैठा गद्दी पर
बात-बात पर झूठ बोलता
कौड़ी-सी स्‍पर्धा में मर-मर!
फिर भी क्‍या कुटुंब पलता है?
रहते स्‍वच्‍छ सुधर सब परिजन?
बना पा रहा वह पक्‍का घर?
मन में सुख है? जुटता है धन?
खिसक गई कंधों में कथड़ी
ठिठुर रहा अब सर्दी से तन,
सोच रहा बस्‍ती का बनिया
घोर विवशता का कारण!

संध्या के बाद कविता का अर्थ: गांव के लोग बड़े ही गरीब, बेइज्जती और नफरत के भावों को भुगतते है। वे बिना खाए-पिए भी रहते है। उनकी इच्छाएं मर गई है क्योंकि पैसे कि कमी के कारण वे पूरी नहीं हो पाती। उनके निम्नतम आय में उनके जीवन को दुःख की परिभाषा बना दिय है।

गांव का दुकानदार निर्जीव अनाज की ढेरी के समान दिन भर दुकान की गद्दी पर बैठा रहता है। उसका समान बहुत कम बिकता है। पैसे के लिए ही वह झूठ बोलता जाता है।

इतना करने के बाद भी उनका परिवार क्या पलता है। वह अपने लिए साफ कपड़े और पक्का घर नहीं बना पाता। वह सुख और धन दोनों ही नहीं जुटा पाता। उसने चीथड़े पहने हुए है। उसका शरीर कांप रहा है। वह ऐसा मजबूरी वाला जीवन क्यों जी रहा है?

शहरी बनियों-सा वह भी उठ
क्‍यों बन जाता नहीं महाजन?
रोक दिए हैं किसने उसकी
जीवन उन्‍नति के सब साधन?
यह क्‍यों संभव नहीं
व्‍यवस्‍था में जग की कुछ हो परिवर्तन?
कर्म और गुण के समान ही
सकल आय-व्‍यय का हो वितरण?
घुसे घरौंदे में मिट्टी के
अपनी-अपनी सोच रहे जन,
क्‍या ऐसा कुछ नहीं,
फूँक दे जो सबमें सामूहिक जीवन?
मिलकर जन निर्माण करे जग,
मिलकर भोग जीवन करे जीवन का,
जन विमुक्‍त हो जन-शोषण से,
हो समाज अधिकारी धन का?

संध्या के बाद कविता का अर्थ: गांव का दुकानदार सोचता है कि वह भी शहरी बनियो की तरह होता। आखिर किसने उसकी प्रगति को रोका है? आजकल संसार की जो व्यवस्था चल रही है उसमे बदलाव जरूर हो चाहिए। वह बदलाव ही हमारे जीवन की दशा को सुधार पाएगा अतः समाज में समानता होनी चाहिए।

लोगों के कामों और लक्षणों के आधार पर बंटवारा होना चाहिए, जबकि येसा नहीं हो रहा है। गांव के लोग अपने-अपने कच्चों घरों में घुसकर अपने-अपने बारे में सोच रहे हैं किस प्रकार लोगों में सामूहिक जीवन आए अर्थात्  सभी लोग एक समान सुविधाओं का उपयोग करें।

इस नए संसार में सभी मिलकर सुविधाओं को बांटे। लोग शोषण मुक्त हो। किस प्रकार साम्यवाद कायम हो सकता है?

दरिद्रता पापों की जननी,
मिटे जनों के पाप, ताप, भय,
सुंदर हो अधिवास, वसन, तन,
पशु पर मानव की हो जय?
वक्ति नहीं, जग की परिपाटी
दोषी जन के दु:ख क्‍लेश की
जन का श्रम जन में बँट जाए,
प्रजा सुखी हो देश देश की!
टूट गया वह स्‍वप्‍न वणिक का,
आई जब बुढि़या बेचारी,
आध-पाव आटा लेने
लो, लाला ने फिर डंडी मारी!
चीख उठा घुघ्‍घू डालों में
लोगों ने पट दिए द्वार पर,
निगल रहा बस्‍ती को धीरे,
गाढ़ अलस निद्रा का अजगर!

संध्या के बाद कविता का अर्थ: निर्धनता ही सारे पापों कि जड़ है। यही निर्धनता सभी प्रकार के दुष्कर्म करती है। कवि की आकांक्षा है कि लोगों के जीवन से पाप, दुःख, भय समाप्त होना चाहिए, लोगों को सारी सूख सुविधाएं मिलनी चाहिए।  तभी जानवर की भावना पर मनुष्यता की भावना की जय होगी।

एक व्यक्ति दोषी न होकर समस्त रूढ़िवादी परंपरा इसके लिए उत्तरदयी है। यदि सबकी मेहनत का फल सबको बराबर मिल जाए तो सारी जनता सुखी हो सकती है। गांव का दुकानदार इस प्रकार का स्वप्न देखता है।

लेकिन वह सपना टूट गया, जब गांव की एक बूढ़ी स्त्री उससे आधा पाव आटा खरीदने आती है वहीं दुकानदार डंडी मारकर तौलता है अर्थात् इस आसमान अर्थवयवस्था के लिए वह स्वयं भी दोषी है। इस तरह सारी बस्ती सो जाती है, जैसे नींद का अजगर उन्हें निगल रहा हो।

क्लास 11 अंतरा भाग 1- Class 11 Hindi Antra Part 1 All Chapter

10. कबीर के पद- कबीर
11. सूरदास के पद- सूरदास
12. हँसी की चोट – देव
13. औरै भाँति- पद्माकर
14. संध्या के बाद- सुमरित्रानन्दन पंत
15. जाग तुझको दूर- महादेवी वर्मा
15. सब आँखों के आँसू उजले
16. नींद उचट जाती है- नरेंद्र शर्मा
17. बादल को घिरते देखा है- नागार्जुन
18. हस्तक्षेप- श्रीकांत वर्मा
19. घर में वापसी- धूमिल

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