Table of Content:
1. खेलत में को काको गुसैयां भावार्थ
2. मुरली तऊ गुपालहिं भावति भावार्थ
3. सूरदास के पद कविता प्रश्न अभ्यास
4. क्लास 11 अंतरा भाग 1 सभी कविताएं

Surdas Ke Pad Class 11 Hindi Antra Chapter 11 Summary

सूरदास के पद- Surdas Ke Pad in Hindi

खेलत में को काको गुसैयां।
हरि हारे जीते श्रीदामा बरबसहीं कत करत रिसैयां॥
जाति पांति हम तें बड़ नाहीं नाहीं बसत तुम्हारी छैयां।
अति अधिकार जनावत हम पै हैं कछु अधिक तुम्हारे गैयां॥
रुहठि करै तासों को खेलै कहै बैठि जहं तहं सब ग्वैयां।
सूरदास प्रभु कैलो चाहत दांव दियौ करि नंद-दुहैया॥

शब्दार्थ :
गुसैयां = स्वामी।

श्रीदामा = श्रीकृष्ण का एक सखा।
बरबस हीं = जबरदस्ती ही।
कत क।ह्यौं। = रिसैयां गुस्सा।
छैयां =  छत्र-छायां के नीचे अधीन।
रुहठि बेमानी। = ग्वैयां सुसखा।

सूरदास के पद का भावार्थ : प्रस्तुत पंक्तियों में सूरदास जी ने खेलते वक्त श्री कृष्ण एवं ग्वाल बालको के बिच हुए वार्तालाप का वर्णन किया है। यहाँ सूरदास जी ने श्री कृष्ण के नटखट बाल रूप का वर्णन किया है।

श्री कृष्ण खेल में हार जाने के बाद भी हार को स्वीकार नहीं कर रहे हैं जैसे की एक बालक का स्वभाव होता है। इसीलिए उनके सखा अर्थात ग्वाल बालक उन्हें कहते हैं की हार गये तो बहुत बुरा लग रहा है। खेल में भी तुम्हे अपना विशेष अधिकार जमाना है।

श्रीदामा (कृष्ण के बड़े भाई) बिलकुल ठीक कहते हैं की तुम जबरदस्ती ही अपनी जीत मनवाना चाहते हो। मगर हम ऐसा होने नहीं देंगे। तुम्हे रूठना हो रूठ जा हम तुमसे डरने वाले नहीं।

खेल में ना कोई मालिक और ना कोई नौकर फिर तुम हमसे बड़े किस बात में हो तुम भी एक ग्वाले हो और हम भी ग्वाले। हम तुम्हारे आधीन तो अपना जीवन नहीं बिता रहे हैं यार फिर तम्हारे राज्य में तो नहीं रह रहे।

तुम राजा होंगे तो अपने घर में हमारे ऊपर क्यू शासन करने आये हो। नंद के राजकुमार तुम्हारे घर में कुछ गौं अधिक हैं पर इसका मतलब ये नहीं की तुम राजा बन गए और खेल में बेमानी करने लगो। तुम तो खेल में बेमानी करते हो तुम्हारे साथ भला कौन खेलेगा।

सूरदास के पद – Surdas Ke Pad in Hindi

मुरली तऊ गुपालहिं भावति।
सुनि री सखी जदपि, नँदलालहिं नाना भाँति नचावति।
राखति एक पाइ ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति।
कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ी ह्वै आवति।
अति आधीन सुजान कनौड़े गिरिधर नार नवावति।
आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर, कर-पल्लव पलुटावति।
भृकुटी कुटिल, नैन नासा-पुट, हम पर कोप करावति।
सूर प्रसन्न जानि एकौ छिन, धर तैं सीस डुलावति।।

शबदार्थ
कटि = कमर।

सुजान = चतुर।
कनौड़े = क्रीतदास।
नार = गर्दन।
अधर सेज्जा = होठों की शय्या।
सन = समान।
घर तैं सीस ढुलावति = धड़ पर सिर हिलवाने लगती है। (नहीं-नहीं का संकेत करवाती है)।

सूरदास के पद का भावार्थ : इस पद में सूरदास जी ने कृष्ण के ऊपर मुरली के प्रभाव और उससे गोपियों को मुरली से होने वाली स्वाभाविक जलन का बड़ा ही स्वाभाविक चित्रा प्रस्तुत किया है। सूरदास जी के पद में एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी!

मुरली श्री कृष्ण को अनेक प्रकार से नाच नचाती है फिर भी मुरली श्री कृष्ण की सबसे अधिक प्रिय है।

मुरली उन्हें एक पैर पर खड़ा करके रखती है और अपना अत्यधिक अधिकार उन पर जताती है। वह कृष्ण के कोमल तन से अपने आज्ञा का पालन करवाती है, जिससे श्री कृष्ण की कमर टेढ़ी हो आती है।

यही नहीं अत्यधिक आधीन किसी दास की तरह वह कृष्ण की गर्दन को झुकवाती है। स्वयं उनके होटो पर विराजमान होकर उनके कोमल हातों से अपने पैरों को दबवाती है। टेढ़ी भृकुटी, बाँके नेत्राों और फड़कते हुए नासिका पुटों से हम पर क्रोध करवाती हैं।

सूरदास जी ने गोपियाँ के माध्यम से अपने इस पद में कहा है की मुरली श्री कृष्ण को एक क्षण के लिए भी प्रसन्न जानकर धड़ से सिर हिलवाती हैं अर्थात नहीं, नहीं का संकेत करवाती है।

गोपियों को श्री कृष्ण सर्वाधिक प्रिय हैं, पर श्री कृष्ण को कोई और प्रिय हो। यह उनके लिए अत्यधिक असहनीय विषय है इसीलिए वे श्री कृष्ण के मुरली के प्रति चिंतित हैं और उनका ऐसा होना स्वाभाविक भी है।

क्लास 11 अंतरा भाग 1- Class 11 Hindi Antra Part 1 All Chapter

10. कबीर के पद- कबीर
11. सूरदास के पद- सूरदास
12. हँसी की चोट – देव
13. औरै भाँति- पद्माकर
14. संध्या के बाद- सुमरित्रानन्दन पंत
15. जाग तुझको दूर- महादेवी वर्मा
15. सब आँखों के आँसू उजले
16. नींद उचट जाती है- नरेंद्र शर्मा
17. बादल को घिरते देखा है- नागार्जुन
18. हस्तक्षेप- श्रीकांत वर्मा
19. घर में वापसी- धूमिल