Sangatkar Class 10 Hindi Kshitij Chapter 9 Summary

संगतकार – मंगलेश डबराल

यहाँ हम पढ़ने वाले हैं:

  1. मंगलेश डबराल का जीवन परिचय – Manglesh Dabral Biography in Hindi
  2. संगतकार कविता का सारांश – Sangatkar Poem Summary
  3. संगतकार – मंगलेश डबराल (Sangatkar- Manglesh Dabral)
  4. Sangatkar Class 10 Summary in Hindi 
  5. Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 9 Sangatkar
  6. Hindi Kshitij Class 10 Poems Summary
  7. Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Question Answer

1. मंगलेश डबराल का जीवन परिचय – Manglesh Dabral Biography in Hindi: Manglesh Dabral (मंगलेश डबराल) समकालीन हिन्दी कवियों में सबसे चर्चित नाम है। इनका जन्म 16 मई 1948 को टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड के काफलपानी गाँव में हुआ था।  इनकी शिक्षा-दीक्षा देहरादून में हुई। मंगलेश डबराल के पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं। पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है और नये युग में शत्रु।

इनकी रचनाओं के लिए इन्हें कई पुरस्कारों, जैसे साहित्य अकादमी, कुमार विकल स्मृति पुरस्कार एवं दिल्ली हिन्दी अकादमी के साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया गया है। कविता के अतिरिक्त वे साहित्य, सिनेमा, संचार माध्यम और संस्कृति के विषयों पर भी लेखन करते हैं। उनका सौंदर्य-बोध सूक्ष्म है और भाषा पारदर्शी है।

2. संगतकार कविता का सारांश – Sangatkar Poem Summary: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने उन लोगों की चर्चा की है, जो कभी प्रसिद्धि का स्वाद नहीं चखते। फिर भी निरंतर कार्य करते चले जाते हैं। उन्हें कभी उनके काम के लिए तारीफ़ सुनने को नहीं मिलती। वे हमेशा अंधकार में जीते हैं, फिर भी वे बिना किसी स्वार्थ के निरंतर अपना काम करते चले जाते हैं। जिस तरह किसी गायक के साथ गाने वाले संगतकार होते हैं। सभी लोग गायक को जानते हैं, उसी की तारीफ़ करते हैं, परन्तु कोई यह नहीं जानता कि उसके साथ कितने संगतकार हैं। जो बिना किसी स्वार्थ के उसकी आवाज को दुर्बल नहीं होने देते।

जब-जब गायक की आवाज लड़खड़ाने लगती है, तब-तब संगतकार अपनी आवाज से गायक की आवाज को बाँध लेते हैं और उसे बिखरने नहीं देते। कभी-कभी तो उन्हें जान-बूझ ख़राब गाना पड़ता है कि कहीं उनकी आवाज़ गायक से अच्छी न हो जाए। वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि मुख्य गायक की प्रसिद्धि में कोई कमी ना आए। जबकि उसे कोई खुद नहीं पहचानता। न ही उसे मान सम्मान मिलता है। फिर भी वह निरंतर बिना किसी स्वार्थ के अपना काम करता रहता है।

3. संगतकार – मंगलेश डबराल (Sangatkar- Manglesh Dabral)

मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीने काल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुअ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था।
तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढ़ाँढ़स बँधाता
कहीं से चला आता है संगीतकार का स्वर
कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
और उसकी आवाज में जो एक हिचक साफ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।

Sangatkar Class 10 Summary in Hindi 

मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीने काल से
संगतकार कविता का भावार्थ :- कवि अपनी इन पंक्तियों में कहता है कि जब मुख्य गायक अपने चट्टान जैसे भारी स्वर में गाता है, तब संगतकार हमेशा उसका साथ देता है। संगतकार की आवाज बहुत ही कमजोर, कापंती हुई प्रतीत हो रही है। लेकिन फिर भी वह बहुत ही मधुर थी, जो मुख्य गायक की आवाज के साथ मिलकर उसकी प्रभावशीलता को और बढ़ा देती है। कवि को ऐसा लगता है कि यह संगतकार गायक का कोई बहुत ही करीब का रिश्तेदार या जान-पहचान वाला है, या फिर ये उसका कोई शिष्य है, जो कि उससे गायकी सीख रहा है। इस प्रकार, वह बिना किसी की नजर में आए, निरंतर अपना कार्य करता रहता है।

गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुअ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थायी को सँभाले रहता है
जैसे समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था।
संगतकार कविता का भावार्थ :-  इन पंक्तियों में कवि ने यह बताने का प्रयास किया है कि जब कोई महान संगीतकार अपने गाने की लय में डूब जाता है, तो उसे गाने के सुर-ताल की भनक नहीं पड़ती और वह कभी-कभी अपने गाने में कहीं भटक-सा जाता है। आगे सुर कैसे पकड़ना है, यह उसे समझ नहीं आता और वह उलझ-सा जाता है।

ऐसी दुविधा के समय में भी उसका सहायक या संगतकार निरंतर अपनी कोमल एवं सुरीली आवाज़ में संगीत के सुर-ताल को पकड़े रहता है। वह मुख्य गायक को कहीं भटकने नहीं देता और संगीत के सुर-ताल को वापस पकड़ने में उसकी सहायता करता है। इस दौरान ऐसा लगता है, मानो मुख्य गायक अपना कुछ सामान पीछे छोड़ते हुए चला जाता है और संगतकार उसे समेटते हुए उसके साथ आगे बढ़ता है। इससे मुख्य लेखक को उसके बचपन की याद आ जाती है, जब वह संगीत सीखा करता था और अक्सर स्वर भूल जाया करता था।

तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढ़ाँढ़स बँधाता
कहीं से चला आता है संगीतकार का स्वर
कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
संगतकार कविता का भावार्थ :- इन पंक्तियों में कवि कहता है कि जब मुख्य गायक ऊँचे स्वर में गाता-गाता थक जाता है और उसके अंदर गाने की इच्छा एवं ऊर्जा समाप्त हो जाती है। उसके स्वर नीचे आने लगते हैं, तब उस वक्त मुख्य गायक का हौसला बढ़ाने और उसके स्वर को फिर से ऊपर उठाने के लिए सहायक का स्वर पीछे से सुनाई देता है। यह सुनकर मुख्य गायक में फिर से ऊर्जा का संसार हो जाता है और वह अपनी धुन में गाता चला जाता है।  कभी-कभी तो वह सिर्फ इसलिए गाता है, मानो मुख्य गायक को यह अहसास दिला रहा हो कि वह अकेला नहीं है और कभी कभी एक राग को दोबारा भी गाया जा सकता है।

और उसकी आवाज में जो एक हिचक साफ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।
संगतकार कविता का भावार्थ : – इस पंक्ति में कवि ने एक सहायक के त्याग को दिखाया है, जो खुद की प्रसिद्धि एवं मान-सम्मान की परवाह किए बिना मुख्य गायक के साथ गाता चला जाता है। उसे इस बात की चिंता भी रहती है कि कहीं वह मुख्य गायक से ज्यादा अच्छे स्वर में ना गा दे और इसी कारणवश उसकी आवाज में एक संकोच या हिचक साफ़ सुनाई देती है। वह हमेशा अपनी आवाज़ मुख्य गायक से धीमी रखने की कोशिश करता है एवं अपनी आवाज को मुख्य गायक की आवाज से ज्यादा उठने नहीं देता। इसे उसकी विफलता नहीं, बल्कि उसका बड़प्पन एवं मनुष्यता समझा जाना चाहिए।

5. Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 9 Sangatkar

6. Hindi Kshitij Class 10 Poems Summary
Chapter 1: सूरदास के पद- सूरदास

Chapter 2: राम लक्ष्मण परशुराम संवाद- तुलसीदास
Chapter 3: सवैया एवं कवित्त – देव
Chapter 4: आत्मकथ्य – जयशंकर प्रसाद
Chapter 5: उत्साह एवं अट नहीं रही है – निराला
Chapter 6: यह दंतुरित मुसकान– नागार्जुन
Chapter 7: छाया मत छूना- गिरिजाकुमार माथुर
Chapter 8: कन्यादान कविता – ऋतुराज
Chapter 9: संगतकार – मंगलेश डबराल

7. Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Question Answer
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 1

Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 2
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 3
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 4
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 5
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 6
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 7
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 8
Ncert Solutions Class 10 Hindi Kshitij Chapter 9

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