फ़िराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ – Rubaiya Class 12 Summary

फिराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ – Rubaiya Class 12 Hindi Chapter 9 Poem Summary

विषय सूचि

  1. फ़िराक गोरखपुरी जी का जीवन परिचय
  2. रुबाइयाँ कविता का सारांश
  3. रुबाइयाँ कविता
  4. रुबाइयाँ कविता की व्याख्या
  5. रुबाइयाँ कविता के प्रश्न उत्तर

फ़िराक गोरखपुरी का जीवन परिचय: फ़िराक गोरखपुरी जी बहुत ही अच्छे एवं जाने-माने उर्दू और फारसी भाषा के शायर थे। 28 अगस्त सन् 1896 को इनका जन्म हुआ था। जैसा कि इनके नाम में ही गोरखपुरी शहर का नाम आया है, तो आप यूं ही समझ गए होंगे कि इनका जन्म भी गोरखपुर में ही हुआ होगा। जी हां बिल्कुल फिराक गोरखपुरी अर्थात रघुवीर सहाय जी का जन्म गोरखपुर में ही हुआ था।

इनकी आरंभिक शिक्षा की शुरुआत राम कृष्ण जी की कहानियों से शुरू हुई थी और आगे चलकर इनकी शिक्षा अंग्रेजी, अरबी एवं फारसी भाषा से पूर्ण हुई।

इनकी शिक्षा पूर्ण होने के बाद सन् 1917 में इनको डिप्टी कलेक्टर की नौकरी भी मिली थी। मगर देश के खातिर सन् 1918 में इन्होंने अपनी नौकरी का त्याग कर दिया। इतना ही नहीं इन्होंने 2 साल जेल में भी गुजारे थे।

इनकी लेखनी के कारण इनको साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया था। इस महान कवि की मृत्यु सन् 1938 में हो गई।

यह आम जिंदगी से जुड़ी शायरी को लिखा करते थे और शायद यही कारण है कि वह आज हम सभी के समक्ष प्रसिद्ध भी है।

इनकी भाषा के संदर्भ में अगर कहा जाए, तो यह उर्दू में लिखा‌ करते थे। हर शायर को इनकी भाषा समझ आती थी और उनको भी जो शायरी पसंद करते थे।

इस कविता में कवि ने मां के स्नेह का वर्णन किया है, जिसका वर्णन हम इस पाठ में करेंगे।


फिराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ – Rubaiya Class 12

आंगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती हैं उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती हैं खिलखिलाते बच्चे की हँसी।

नहला के छलके-छलके निर्मल जल से
उलझे हुए गेसुओं में कंघी
किस प्यार से देखता हैं बच्चा मुँह को
करके जब घुटनियों में लेके हैं पिन्हाती कपड़े।

दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती हैं दिए।

आँगन में ठुनक रहा है जिदयाय है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे देके कह रही हैं माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है

रक्षाबंदन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी


फ़िराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ कविता की व्याख्या – Rubaiya Class 12 Summary


आंगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती हैं उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती हैं खिलखिलाते बच्चे की हँसी।

Rubaiya Class 12 Summary: फिराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ कविता के प्रथम अंश में कवि मां और बच्चे के बीच के संपर्क के बारे में चर्चा करते हैं और बताते हैं कि एक मां अपने चांद के टुकड़े को यानि की अपने बच्चे को अपने घर के आंगन में गोद में लेकर खड़ी है और कभी उसे ऊपर उछाल रही है, तो कभी अपने गोद में रख रही है। मां और बच्चे का यह प्रेम कुछ ऐसा प्रतीत होता है, मानो स्वर्ग ही नीचे आगया हो।

बच्चा जब छोटा होता है, तो वह अपने मां के बेहद करीब होता है। वह हर वक्त अपने मां के स्पर्श को प्राप्त कर मन ही मन बहुत ही खुश होता है। उसे लगता है कि जब तक उसकी मां उसके पास है, तब तक कोई भी खतरा उसे छू नहीं सकता है और इसी खुशी में जब-जब उसकी मां उसे ऊपर उछालती है वह तब तब खिलखिला कर हंसता रहता है। बच्चे की हंसी की किलकिलाहट से उस घर का संपूर्ण आंगन खुशी से झूम उठता है।



नहला के छलके-छलके निर्मल जल से
उलझे हुए गेसुओं में कंघी
किस प्यार से देखता हैं बच्चा मुँह को
करके जब घुटनियों में लेके हैं पिन्हाती कपड़े।

Rubaiya Class 12 Summary: फिराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ कविता के इस अंश में कवि ने मां और बच्चे के उस दृश्य के बारे में बताया है, जहां पर एक मां अपने बच्चे को अच्छे पानी से नहलाती है। जब बच्चा साफ पानी से नहाता है, तो वह साफ पानी बच्चे के उलझे हुए बाल में साफ-साफ दिखाई पड़ता हैं। मां बच्चे को नहलाने के बाद उसके उलझे हुए बालों को कंघी से ठीक करती है।

कंघी करने के बाद मां अपने बच्चे को कपड़े पहनाने की तैयारी करती है। उसका बच्चा छोटा है, जिस कारण वह बहुत ज्यादा उछलता है। इसलिए मां उस बच्चे को अपने घुटनों के बीचो-बीच रखती है, ताकि वह इधर उधर हीले ना और मां आसानी से अपने बच्चे को कपड़े पहना सके। जब मां अपने बच्चे को अपने घुटनों के बीच में रखकर कपड़े पहनाती है, तब वह बच्चा एक टक बिना पलक झुकाए मां को देखता रहता है।


दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती हैं दिए।

Rubaiya Class 12 Summary: फिराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने दिवाली का वर्णन किया है। दिवाली एक दीपों का त्यौहार है, जिसमें चारों ओर घर में खुशियां ही खुशियां होती है। बस उसी दृश्य का वर्णन कवि ने यहां पर किया है।

कवि कहते हैं कि दिवाली के पर्व पर हर घर चारों ओर दीपों से प्रज्वलित होता है। हर घर की साफ सफाई होती है और हर घर बिल्कुल सुंदर दिखता है। प्रकाश मय दिखता है। ऐसे शुभ अवसर पर एक मां अपने बच्चे को खुशी प्रदान करने के लिए उसके लिए चीनी मिट्टी के खिलौने लाती है। उस खिलौने को बच्चे को देकर उसे भी खुशी प्रदान करती है।

फिर मां घर के चारों ओर प्रदीप प्रज्वलित करती है और अपने बच्चे के घरौंदे में एक दीप जलाती है। जिसकी चमक से मां का चेहरा अति सुंदर दिखने लगता है।


आँगन में ठुनक रहा है जिदयाय है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे देके कह रही हैं माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है

Rubaiya Class 12 Summary: फिराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ कविता के इस अंश में कवि ने बालक की नाराजगी का वर्णन किया है। एक मां अपने बच्चे की खुशी के लिए उसकी सारी मनोकामना को, उसकी सारी जिद को पूरी करती है।

यहां पर यह बच्चा रुठा हुआ है कि उसे चांद रूपी खिलौना ही चाहिए। अर्थात वही चांद चाहिए, जो उसने अभी आसमान पर देखा है। मां उसे मनाने की कोशिश करती है, मगर बच्चा मानता नहीं है। आखिर में मां एक दर्पण लाती है। आईना लाकर वह बच्चे को चांद का प्रतिबिंब दिखाती है और कहती है कि देख यह रहा तेरा चांद। बच्चा उस बिंब को ही चांद मानकर मन ही मन खुश हो जाता है और हंसने लगता है। बच्चे की उस हंसी पर मां को भी शांति मिलती है।


रक्षाबंदन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी

Rubaiya Class 12 Summary: फिराक गोरखपुरी की रुबाइयाँ की इन पंक्तियों में कवि ने रक्षाबंधन का वर्णन करते हुए भाई-बहन के रिश्ते को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कवि कहते हैं कि रक्षाबंधन एक मीठा बंधन है। रक्षाबंधन के दिन सुबह से ही भाई-बहन बड़े उत्सुक रहते हैं।

रक्षाबंधन सावन के महीने में आता है। इन पंक्तियों में सावन का संबंध झीनी घटा से है। यहाँ कवि ने मौसम का जो वर्णन किया है जैसे, आसमान में हल्की-हल्की घटाएँ छाई हुई हैं। इन घटाओं में बिजली चमक रही है। घटा का जो संबध बिजली से है-वही संबंध भाई का बहन से होता है। राखी के लच्छे भी बिजली की तरह चमकते हैं। जब बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, तो ये लच्छे और भी चमक उठते हैं।


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