Class 12 Chota Mera Khet Summary – छोटा मेरा खेत

Class 12 Hindi Chapter 10 Chota Mera Khet Summary – छोटा मेरा खेत/बगुलों के पंख कविता की व्याख्या

उमाशंकर जोशी का जीवन परिचय:
कवि उमाशंकर जोशी जी का जन्म गुजरात में सन् 1911 ई. को हुआ था। इनकी कविता का प्रसिद्ध होने का एक ही कारण था कि यह कविता को मन से लिखते थे। लोगों को अपने हृदय से जोड़ते थे और उनको अपनी कविता में जगह देते थे। शायद यही कारण है कि आज उमाशंकर जोशी हमारे बीच बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हैं। ना सिर्फ हिंदी साहित्य में बल्कि गुजराती साहित्य में भी उनका नाम बहुत ही बहुचर्चित है।
20 वीं सदी में प्रवेश करते ही इन्होंने गुजराती साहित्य को एक नई पहचान दी, एक नई दिशा दिखाई।
इतना ही नहीं कवि उमाशंकर जोशी अपनी मातृभूमि से बहुत ज्यादा प्रेम करते थे। तभी तो वह देश की आजादी की लड़ाई में भाग भी लेते थे एवं अपनी मातृभूमि के खातिर वह कई बार जेल भी गए थे

उमाशंकर जोशी की प्रमुख रचनाएं:
इन्होनें वसंत वर्षा, विश्वशांति जैसे एकांकी लिखी। अभिज्ञान शकुंतलम का इन्होंने गुजराती भाषा में अनुवाद भी किया। इस तरह से कहा जा सकता है कि उमाशंकर जोशी ना सिर्फ एकांकी, निबंध, कहानी, उपन्यास लिखा करते थे बल्कि अनुवाद कार्य में भी वे निपूर्ण थे।

उमाशंकर जोशी जी ने जो भी योगदान हिंदी साहित्य एवं गुजराती साहित्य को प्रदान किया वह सारे योगदान भारतीय साहित्य के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। इनके प्रसिद्ध होने का एक और कारण यह भी है कि यह बहुत ही सरल भाषा में लिखा करते थे और इनकी कविता जनसाधारण को भी समझ में आती थी।


उमाशंकर जोशी जी ने जितना योगदान गुजराती साहित्य में दिया, उतना ही योगदान इन्होंने हिंदी साहित्य में भी दिया। मगर एक मजबूत निबंधकार के रूप में उमाशंकर जोशी गुजराती साहित्य में बहुत ज्यादा ही प्रसिद्ध हैं एवं यह स्थान आज तक कोई और नहीं ले पाया है।

इस कविता में कवि ने एक किसान के रूप में खुद को दर्शाया है। कवि भी एक कर्मठ किसान की तरह होता है, जो खेतों में बीज बोता है। खेत चकोर होता है, उसी प्रकार ही एक कवि भी चकोर आकार के एक पन्ने में कुछ बीज अंकुरित करता है, जो आगे जाकर एक विशाल रूप धारण करता है। जिस तरह एक किसान अपने खेत के लिए दिन रात मेहनत करता है और खेती करता है, ठीक उसी प्रकार कवि भी दिन रात मेहनत करता है, कविताएं लिखता है और उस कविता को अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए इस हद तक प्रयास करता है, जिससे कि हर एक पाठक को कवि की बात समझ में आ सके।

दूसरी ओर कवि कहते हैं कि किसान द्वारा बोए गए बीच की कटाई हो जाती है और वह कम हो जाता है। मगर कविता का बीज जब एक बार अंकुरित हो जाता है, तो उसे कटाई करने से भी वह कभी भी कम नहीं होता है, बल्कि वह बढ़ता ही जाता है। जैसे-जैसे दिन बिता चला जाता है, वैसे-वैसे कविता का बीज और भी मजबूत होता जाता है। वह कभी खत्म नहीं होता है क्योंकि साहित्य रूपी रस कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। वह तब तक जिंदा रहेगा, जब तक मानव जिंदा रहेंगे। वह तब तक जिंदा रहेगा, जब तक कवि जिंदा रहेगा।

छोटा मेरा खेत कविता का सारांश- CHOTA MERA KHET KAVITA KA SARANSH

छोटा मेरा खेत कविता में कवि उमा शंकर जोशी जी ने कवि के हर कर्म को एक चरण के रूप में बांधने का प्रयास किया है। कविता में कवि को खेत कागज के पन्ने जैसा चौकोर लगता है। कागज के पन्ने जैसे चौकोर खेत में कवि को भावनात्मक आंधी के प्रभाव द्वारा बीज बोया हुआ दिखाई पड़ता है।
कवि के अनुसार यह बीज कल्पना का सहारा लेकर धीरे-धीरे विकसित होता है फिर उन बीजों से शब्द रूपी अंकुर निकलते हैं और अंत में कृषि की सहायता से यही बीज आगे जाकर प्रफुल्लित होता है।

लेकिन कवि के अनुसार खेतों में पैदा होने वाले बीज अंत में कटकर अपनी पहचान गवाँ बैठते हैं, जबकि कविता में बोया हुआ बीज यदि एक बार उपजाऊ हो जाता है, तो यह कभी भी किसी भी कीमत में नहीं कटता है और ना ही इसकी अपनी पहचान नष्ट होती है।

छोटा मेरा खेत कविता – Chota Mera Khet Poem

छोटा मेरा खेत चौकोना
कागज़ का एक पन्ना,
कोई अंधड़ कहीं से आया
क्षण का बीज वहाँ बोया गया ।

कल्पना के रसायनों को पी
बीज गल गया नि:शेष;
शब्द के अंकुर फूटे,
पल्लव-पुष्पों से नमित हुआ विशेष।

झूमने लगे फल,
रस अलौकिक,
अमृत धाराएँ फूटतीं
रोपाई क्षण की,
कटाई अनंतता की
लुटते रहने से ज़रा भी नहीं कम होती।

रस का अक्षय पात्र सदा का
छोटा मेरा खेत चौकोना।

छोटा मेरा खेत कविता व्याख्या – CHOTA MERA KHET POEM LINE BY LINE EXPLANATION

छोटा मेरा खेत चौकोना
कागज़ का एक पन्ना,
कोई अंधड़ कहीं से आया
क्षण का बीज वहाँ बोया गया ।

छोटा मेरा खेत कविता की व्याख्या:
छोटा मेरा खेत कविता में उमा शंकर जोशी जी ने कवि कर्म की तुलना कृषि कर्म से की है। कवि यहां पर पन्ने को खेत कहते हैं। पन्ना अर्थात पेज जिस पर हम लिखते हैं और विचारों को कवि ने बीज माना है। यानी जिस तरीके से खेत पर किसान खेती करता है, ठीक उसी तरह पन्ने पर कवि कविता लिखता है। कृषि बीज के माध्यम से खेती उगाता है और कवि अपने विचार रूपी बीज के माध्यम से कविता को लिखता है। 

जिस तरह किसान खेत में बीज बो देता है उसके बाद आंधी तूफान इत्यादि के आने के बाद उस बीच का रोपण होता है, ठीक उसी प्रकार जब कवि के मन में विचार रूपी आंधी उत्पन्न होती है, भाव उत्पन्न होते हैं, तो यही भाव आगे चलकर कविता का रूप धारण कर लेते हैं।

कल्पना के रसायनों को पी
बीज गल गया नि:शेष;
शब्द के अंकुर फूटे,
पल्लव-पुष्पों से नमित हुआ विशेष।

छोटा मेरा खेत कविता की व्याख्या:
प्रस्तुत काव्य पंक्तियां कवि उमाशंकर जोशी द्वारा रचित हैं। इन काव्य पंक्तियों के माध्यम से कवि कहते हैं कि मुझे कागज का पन्ना एक चौकोर खेत के समान लगता है आगे चलकर कवि कहते हैं कि जिस तरीके से कृषि द्वारा खेतों में सोए हुए बीज को हवा, आंधी तूफान ,वर्षा, नमी, शुष्क, गर्मी  इत्यादि प्राप्त होने के बाद बीज अंकुरित होता दिखाई देता है।

ठीक उसी प्रकार कविता में भी कवि द्वारा बोए गए बीज को कल्पना के माध्यम से भाव के माध्यम से ही पोषण प्राप्त होता है। बिना कल्पना के, बिना भाव के कवि द्वारा कोई भी बीज यानी कि विचार अंकुरित नहीं हो सकता है, क्योंकि इनके बिना तो कविता लिखी ही नहीं जा सकती है।

इसलिए कविता लिखते वक्त कल्पना का होना, भावों का होना बहुत अधिक जरूरी है। अगर ये नहीं होंगे, तो ‌कविता लिख पाना असंभव है। जब शब्द रूपी बीज बढ़कर पेड़ का रूप लेते हैं, तब उसमें अलंकार रूपी नए छंद एवं भाव रूपी पत्ते का जन्म होता है।

इस चौकोर कागज के खेत में जो बीज बोए जाते हैं, वे भावात्मक बीज होते हैं। यह बीज कवि मन के भाव से उनके अहंकार को समाप्त करता है। अहंकार के समाप्त होते ही कवि की रचना में शब्द रूपी अंकुर प्रफुल्लित होते हैं, यही अंकुर आगे बढ़कर रचना का रूप ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार खेती के दौरान भी बीज विकसित होता है, जो आगे चलकर पौधे का विशाल रूप धारण करता है एवं धीरे-धीरे वह पौधा पत्तों एवं फूलों से लदकर अंत में झुक जाता है।

कठिन शब्दचौकोना– चार कोना, अधड़– आंधी, पल्ल्व– पत्तें, नमित- झुका हुआ।

झूमने लगे फल,
रस अलौकिक,
अमृत धाराएँ फूटतीं
रोपाई क्षण की,
कटाई अनंतता की
लुटते रहने से ज़रा भी नहीं कम होती।

रस का अक्षय पात्र सदा का
छोटा मेरा खेत चौकोना।

छोटा मेरा खेत कविता की व्याख्या:
आगे बढ़ते हुए कवि कहते हैं कि जब पन्ने रूपी खेत में कविता रूपी फूल खिलने लगते हैं, तो उसके अंदर एक अद्भुत रस देखने को मिलता है। यह रस अमृत जैसा होता है। कवि के अनुसार यह रचना ऐसे क्षण में रची गई थी, जिसका फल उन्हें उनके जीवन के अंत काल तक मिलता रहेगा। कवि कविता रूपी इस रस को जितना लुटाने की चेष्टा करते हैं, यह रस उतना ही अधिक बढ़ता चला जाता है।

कवि के अनुसार पेड़ बड़ा होते-होते एक दिन समाप्त हो जाता है। उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है, लेकिन कविता रूपी खेत कभी भी समाप्त नहीं होता। उसकी कटाई कभी समाप्त नहीं होती और ना ही उसका अस्तित्व कभी खत्म होता है।

छोटा मेरा खेत कविता के अंतिम छंद में कवि उमाशंकर जोशी जी ने कृषि रूपी फसल का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि उनके कृषि रूपी खेत में अलौकिक रुपी फल आ चुके हैं। अलौकिक से यहां तात्पर्य कोई ऐसी चीज से है, जो ना यहां मिलता हो और ना ही दूसरे लोक में मिलता हो। कहने का तात्पर्य यह है कि जब कोई कवि एक कविता को लिखता है, तो उसकी कविता के सारे बोल, समस्त भाव उसकी अपनी होती है, जो अलौकिक होती है।

कविता अलग होने के कारण पाठकों को बहुत ज्यादा आनंद आता है। जब पाठक ऐसी कविताओं को पढ़ते हैं, तो उन्हें परम आनंद मिलता है। उन्हें ऐसा लगता है कि मानो वह अमृत का पान कर रहे हों।

वहीं कवि दूसरी ओर कहते हैं कि जब कल्पना का बीज एक बार रोपण कर दिया जाता है, तो यह बीज ऐसा बीज होता है, जिसको काटने से भी कभी कमता नहीं है। ये तो इसके विपरीत बढ़ता ही चला जाता है, क्योंकि यह भावों का बीज है, कल्पना का बीज है, जिसे आप जितना काटेंगे वह कमेगा नहीं, बल्कि बढ़ता ही चला जाएगा।

यही कारण है कि प्रसिद्ध कवि की कविता युगो युगो तक पाठकों को पसंद आती है और कवि द्वारा एक क्षणभर में की गई कल्पना, एक कालजयी कविता को जन्म देता है।

रहीमदास, तुलसीदास, कबीर, सूरदास इत्यादि ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताओं को, लेखनी को आज भी हम पढ़ते हैं और हर युग में इनकी कविताओं को पढ़ा जाएगा क्योंकि इनकी रचना है ही ऐसी, जो हर व्यक्ति के आत्मा को छू जाती हैं।

अंतिम छंद में कवि कहते हैं कि आप चाहे जितना ऐसी कविताओं का आनंद लें, लुत्फ़ उठाएं, लेकिन इनका रस कभी खत्म नहीं होगा। कवि के अनुसार साहित्य का आनंद कभी भी समाप्त नहीं हो सकता है। किसान की फसल खत्म हो सकती है, मगर साहित्य रूपी आनंद नहीं। 

कवि अपने चौकन्ने खेत की तुलना अमृत पात्र से करते हैं, जो कभी भी खाली नहीं रहता है।

कठिन शब्द- अलौकिक– कभी ना दिखने वाला, अनतता– सदा के लिए।

बगुलों के पंख कविता का सारांश- BAGULE KE PANKH POEM SHORT SUMMARY

बगुलों के पंख कविता की रचना कवि उमा शंकर जोशी द्वारा की गई है। इस कविता में कवि ने हमारे समक्ष प्रकृति के सुंदर दृश्यों का सजीव चित्रण किया है। कवि कहते हैं कि प्रकृति के सुंदर दृश्य का वर्णन करने के लिए हर कवि अलग-अलग युक्तियां अपनाते हैं और इनमें से जो सबसे ज्यादा प्रचलित है, वह है किसी भी दृश्य का चित्रात्मक वर्णन करना और उस चित्रात्मक वर्णन का प्रभाव व्यक्ति के मन पर पड़ना। 

प्रस्तुत कविता में कवि बादलों से घिरे हुए आकाश में सफेद बगुलों को पंक्ति बनाकर उड़ते हुए देखते हैं। जब बगुले आकाश में उड़ते हैं, उस वक्त वे किसी सफेद काया की तरह दिखाई पड़ते हैं। कवि को वह दृश्य बहुत ही अच्छा लगता है और उस दृश्य में कवि बिल्कुल पूरी तरह से सब कुछ भूल कर खो जाते हैं। वे स्वयं को इस दृश्य में होने से बचाने के लिए गुहार करते हैं, लेकिन फिर भी वह स्वयं को नहीं बचा पाते।

बगुलों के पंख कविता की व्याख्या- BAGULE KE PANKH POEM LINE BY LINE EXPLANATION

नभ में पाँती-बाँधे बगुलों के पंख,
चुराए लिए जातीं वे मेरा आँखे।
कजरारे बादलों की छाई नभ छाया,
तैरती साँझ की सतेज श्वेत  काया
हले हॉले जाती मुझे बाँध निज माया से।
उसे कोई तनिक रोक रक्खो।
वह तो चुराए लिए जाती मेरी आँखे
नभ में पाँती-बँधी बगुलों के पाँखें। 

बगुलों के पंख कविता की व्याख्या:
कवि उमा शंकर जोशी प्रस्तुत काव्य पंक्तियों के माध्यम से बताते हैं कि आकाश में घिरे हुए काले-काले बादलों में सफेद बगुले को उड़ते हुए मैंने देखा है। आगे कवि कहते हैं, जब यह सफेद बगुले आकाश में पंक्तियों में उड़ते हैं, तो मैं सिर्फ उन्हें देखता रहता हूं।

पंक्तियों में बगुलों का यूँ आकाश में उड़ना मेरी नज़रे चुरा लेता है। मुझे यह दृश्य ऐसा लगता है, मानो कोई सफेद काया आसमान पर तैर रही है।
कवि कहते हैं कि यह दृश्य मुझे इतना आकर्षक लगता है कि मुझे ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने मुझे अपने इस जादू भरे आकाश में बांध लिया है और मैं उस जादू में वशीभूत होकर उस दृश्य को देखने के लिए खो जा रहा हूं।
कवि अंत में आवाहन करते हैं कि मुझे इस आकर्षक दृश्य को देखने से कोई आकर रोक ले। क्योंकि इस दृश्य को देखने के लिए मैं सब कुछ भूल जाता हूं। मुझे उस वक्त कुछ भी याद नहीं रहता है और अंत में कवि गुहार लगाते-लगाते थक जाते हैं और अपने आप को इस मनमोहक दृश्य से बाहर निकालने में असफल हो जाते हैं।

कठिन शब्दनभ– आकाश, कजरारे- वाले, काया– शरीर।

 

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