हम पंछी उन्मुक्त गगन के – Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke

Hindi Vasant Class 7 Chapter 1

हम पंछी उन्मुक्त गगन के – Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke Vasant Bhag 2

शिवमंगल सिंह सुमन का जीवन परिचय(Shivmangal Singh Suman Ka Jeevan Parichay): हिंदी भाषा के महान कवि शिवमंगल सिंह सुमन का जन्म 5 अगस्त 1915 को झगरपुर, उन्नाव (उत्तरप्रदेश में) हुआ। इनकी कविताओं की भाषा सरल और दिल को छू लेने वाली है।

इनकी प्रमुख कृतियाँ हिल्लोल, मिट्टी की बारात, प्रलय सृजन और वाणी की व्यथा हैं। इनकी उत्कृष्ट रचनाओं के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत भारती पुरस्कार जैसे बड़े सम्मानों से सम्मानित किया गया।

27 नवम्बर 2002 को इन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मगर, इनकी महान रचनाएं हमेशा हमारे बीच अमर रहेंगी।

Hindi Vasant Class 7 All Chapters Summary
Chapter 01. हम पंछी उन्मुक्त गगन के (शिवमंगल सिंह)
Chapter 04. कठपुतली (भवानी प्रसाद मिश्र)
Chapter 08. शाम- एक किशन (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)
Chapter 11. रहीम के दोहे (रहीम)
Chapter 13. एक तिनका (अयोध्या सिंह उपाध्या)
Chapter 16. भोर और बरखा कविता (मीरा बाई)
Chapter 20. विप्लव गायन (बालकृष्ण शर्मा “नवीन”)


हम पंछी उन्मुक्त गगन के – Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke Poem

हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएंगे ।

हम बहता जल पीनेवाले
मर जाएंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।

स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी ।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।


हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता का सारांश (Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke Summary): कवि शिवमंगल सिंह सुमन ने हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता में पक्षियों के जरिये स्वतंत्रता के महत्व का वर्णन किया है। कविता में पक्षी कहते हैं कि हम खुले आसमान में घूमने वाले प्राणी हैं, हमें पिंजरे में बंद कर देने पर हम अपने सुरीले गीत नहीं गा पाएंगे। 

हमें सोने के पिंजरे में भी मत रखना, क्योंकि हमारे पँख पिंजरे से टकराकर टूट जाएंगे और हमारा जीवन ख़राब हो जाएगा। हम स्वतंत्र होकर नदी-झरनों का जल पीते हैं, पिंजरे में हम भला क्या खा-पी पाएंगे। हमें गुलामी में सोने के कटोरे में मिले मैदे से ज्यादा, स्वतंत्र होकर कड़वी निबौरी खाना पसंद है। 

आगे कविता में पंछी कहते हैं कि पिंजरे में बंद होकर तो पेड़ों की ऊँची टहनियों पर झूला झूलना अब एक सपना मात्र बन गया है। हम आकाश में उड़कर इसकी हदों तक पहुंचना चाहते थे। हमें आकाश में ही जीना-मरना है। 

अंत में पक्षी कहते हैं कि तुम चाहे हमारे घोंसले और आश्रय उजाड़ दो। मगर, हमसे उड़ने की आज़ादी मत छीनो, यही तो हमारा जीवन है।


हम पंछी उन्मुक्त गगन के भावार्थ- Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke Meaning 

हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएंगे ।

हम बहता जल पीनेवाले
मर जाएंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता का अर्थ: कवि शिवमंगल सिंह सुमन ने हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता की इन पंक्तियों में पंछियों की स्वतंत्र होने की चाह को दर्शाया है। इन पंक्तियों में पक्षी मनुष्यों से कहते हैं कि हम खुले आकाश में उड़ने वाले प्राणी हैं, हम पिंजरे में बंद होकर खुशी के गीत नहीं गया पाएंगे। आप भले ही हमें सोने से बने पिंजरे में रखो, मगर उसकी सलाख़ों से टकरा कर हमारे कोमल पंख टूट जाएंगे। 


आगे पक्षी कह रहे हैं कि हम तो बहते झरनों-नदियों का जल पीते हैं। पिंजरे में रहकर हमें कुछ भी खाना-पीना अच्छा नहीं लगेगा। चाहे आप हमें सोने की कटोरी में स्वादिष्ट पकवान लाकर दो, हमें तब भी अपने घोंसले वाले नीम की निबौरी ज्यादा पसंद आएगी। पिंजरे में हम कुछ भी नहीं खाएंगे और भूखे-प्यासे मर जाएंगे।

स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।
हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता का अर्थ: कवि शिवमंगल सिंह जी ने हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता की इन पंक्तियों में पिंजरे में बंद पक्षियों का दुख-दर्द दिखाया है। पिंजरे में बंद रहते-रहते बेचारे पक्षी अपनी उड़ने की सब कलाएं और तेज़ उड़ना भूल चुके हैं। कभी वो बादलों में उड़ा करते थे, पेड़ों की ऊँची टहनियों पर बैठ करते थे। अब तो उन्हें बस सपने में ही पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर बैठना नसीब होता है। 

पंछियों के मन में यह इच्छा थी कि वो उड़कर आसमान की सभी सीमाओं को पार कर जाएं और अपनी लाल चोंच से सितारों को दानों की तरह चुनें। मगर, इस गुलामी भरी ज़िंदगी ने उनके सभी सपनों को चूर-चूर कर दिया है। अब तो पिंजरे में कैद होकर रह गए हैं और बिल्कुल खुश नहीं हैं। 

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी ।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।
हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता का अर्थ: कवि शिवमंगल सिंह सुमन जी ने हम पँछी उन्मुक्त गगन के कविता की आखिरी पंक्तियों में पक्षियों की स्वतंत्र होकर उड़ने की इच्छा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है।

इन पंक्तियों में पक्षी कहते हैं कि अगर हम आजाद होते तो उड़कर इस आसमान की सीमा को ढूंढने निकल जाते। अपनी इस कोशिश में हम या तो आसमान को पार कर लेते, तो फिर अपनी जान गंवा देते। पक्षियों की इन बातों से हमें पता चलता है कि उन्हें अपनी आज़ादी कितनी प्यारी है।

हम पंछी उन्मुक्त गगन के कविता की आखिरी पंक्तियों में मनुष्यों से उन्हें स्वतंत्र कर देने की विनती की है। वो मनुष्यों से कहते हैं कि आप हमसे हमारा घोंसला छीन लो, हमें आश्रय देने वाली टहनियां छीन लो, हमारे घर नष्ट कर दो, लेकिन जब भगवान ने हमें पंख दिए हैं, तो हमसे उड़ने का अधिकार ना छीनो। कृपया हमें इस अंतहीन आकाश में उड़ने के लिए स्वतंत्र छोड़ दो।


Ncert Solutions for Class 7 Hindi Chapter 1- Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke Question Answer

1. हर तरह की सुख सुविधाएँ पाकर भी पक्षी पिंजरे में बंद क्यों नहीं रहना चाहते?
उत्तर. पक्षी सभी तरह की सुख-सुविधाएं पाकर भी पिंजरे में बंद नहीं रहना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी स्वतंत्रता इन सभी सुख-सुविधाओं से कहीं ज्यादा प्यारी है। उन्हें स्वतंत्र आकाश में उड़ना, नदियों-झरनों का शीतल जल पीना, कड़वी निबौरियाँ खाना ज्यादा पसंद है।

2. पक्षी उन्मुक्त रहकर अपनी कौन-कौन सी इच्छाएँ पूरी करना चाहते हैं?
उत्तर. पक्षी उन्मुक्त यानी स्वतंत्र रहकर नीम की निबौरियाँ खाने, ऊँचे आकाश की सीमाएं नापने, नदी-झरनों का जल पीने, वृक्षों की सबसे ऊँची डाल पर झूलने और आसमान में खुलकर उड़ने की इच्छाएं पूरी करना चाहते हैं।

3. भाव स्पष्ट कीजिए –
“या तो क्षितिज मिलन बन जाता/या तनती साँसों की डोरी।”
उत्तर. प्रस्तुत पंक्ति में पक्षी आसमान की सीमाओं को नापने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं। इस प्रयास में या तो वे सफल हो जाएंगे या फिर प्राण त्याग देंगे। मगर, वो ऐसा करने से पीछे बिल्कुल नहीं हटेंगे। 

2 thoughts on “हम पंछी उन्मुक्त गगन के – Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke”

  1. U can make MCQ questions for HUM PANCHHI UNMUKT GAGAN KE and out of box long and short questions so it would be easy to learn.

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