सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या | Saharsh Sweekara Hai Poem Explanation

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या कक्षा 12 चैप्टर 5 | Saharsh Sweekara Hai Poem Explanation Class 12 Chapter 5

Table of content

  1. गजानन माधव मुक्ति बोध का जीवन परिचय
  2. सहर्ष स्वीकारा है कविता का सारांश 
  3. सहर्ष स्वीकारा है कविता 
  4. सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या
  5. सहर्ष स्वीकारा है कविता के प्रश्न उत्तर

गजानन माधव मुक्ति बोध का जीवन परिचय – Gajanan Madhav Muktibodh ka Jeevan Parichay

गजानन माधव मुक्ति बोधइनका जन्म 13 नवंबर 1917 में हुआ था। इन्होनें हिंदी साहित्य में  आलोचक, ऋण निबंध, कहानीथा उपन्यास लिखे। इन्हें प्रगति शील कविता और नई कविताओं के बीच का सेतु भी माना जाता है। मुक्ति बोध तार सप्तक के पहले कवि थे।

 यह दुर्भाग्य ही था कि इनकी मृत्यु से पहले केवल इनकी एक ही पुस्तक प्रकाशित हो पायी, जो श्रीकांत वर्मा ने करवाया था। इस पुस्तक का नाम एक साहित्यिक की डायरी थी l


अपने प्रारंभिक जीवन में गजानन माधव मुक्ति बोध जी मिडिल स्कूल की परीक्षा में फेल हो गए और अपने इसी अनुभव से सीख कर आगे लेखन और पत्रकारिता से जुड़ गए l इन्होंने शांता नामक युवती से प्रेम विवाह किया था l

इनकी रचनाओं में मनुष्य की अस्मिता, आत्म संघर्ष और प्रखर राजनितिक चेतना थी l एक साहित्यिक की डायरी का दूसरा संस्करण इनकी मृत्यु के दो महीने के बाद भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ l ज्ञानपीठ ने ही इनकी मृत्यू उपरांत “चांद का मुह टेढ़ा हैप्रकाशित करवाई।

इनकी मुख्य कृतियाँचाँद का मुह टेढ़ा है (कविता संग्रह) नई कविता का आत्म संघर्ष, काठ का सपना, सतह से उठता आदमी, भूरी भूरी खाक धूल इत्यादी है।

सहर्ष स्वीकारा है कविता का सारांश – SAHARSH SWIKARA HAI POEM SUMMARY

प्रस्तुत कविता सहर्ष स्वीकारा है कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की बहुत ही छोटी कविता है। ‌वैसे तो कवि मुक्तिबोध जी ने बहुत कम ही छोटी कविताएं लिखी हैं। उनमें से सहर्ष स्वीकारा एक प्रमुख कविता है। कवि गजानन मुक्तिबोध का काव्य संग्रह भूरी भूरी खाक धूल सहर्ष स्वीकारा है कविता को दिया गया है।

सहर्ष स्वीकारा है का अर्थ है आसानी से खुशी से सब कुछ स्वीकार कर लेना। इस कविता में कवि ने अपने जीवन के संपर्क में कहा है कि उन्होंने अपने जीवन में सब कुछ आसानी से स्वीकार कर लिया है, चाहे वह सुख हो या दुख। उनके जीवन में उन्हें सुख-दुख जिस रूप में प्राप्त हुआ उन्होंने उसी रूप में उसे स्वीकार किया है।

कविता में कवि अपने प्रेमिका को याद करते हैं एवं अपनी प्रेमिका की तुलना पानी के झरने से करते हैं। कवि ने अपनी प्रेमिका की तुलना चांद से भी की है, क्योंकि उनको लगता है कि जिस प्रकार आकाश में चांद हंसता है, उसी तरह उनकी प्रेमिका भी हंसती है। 

कविता के अंत में कवि अपनी प्रेमिका को भूलना चाहते हैं और वह यह भी कहते हैं कि उनकी प्रेमिका उन्हें इस बात के लिए दंड दे कि वह अपनी प्रेमिका को क्यों भूलना चाहते हैं। कवि स्वयं को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं।

सहर्ष स्वीकारा है कविता – SAHARSH SWIKARA HAI POEM

जिंदगी में जो कुछ है, जो भी है
सहर्ष स्वीकारा है;
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है।
गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब
यह
विचार-वैभव सब
दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अनुभव सब
मौलिक है, मौलिक है
इसलिए कि पल पल में
कुछ भी जागृत है अपलक है-
संवेदन तुम्हारा है!! 

जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है
जितना भी उँड़ेलता हूँ, भरभर फ़िर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुस्काता चाँद ज्यों धरती पर रात भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

सच मुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैं
तुम्हें भूल जाने की
दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अन्तर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी मे नहा लूँ मैं
इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित
रहने का रमणीय यह उजेला अब
सहा नहीं जाता है।
नहीं सहा जाता है।
ममता के बादल कि मंडराती कोमलता-
भीतर पिराती है
कमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह
छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है
बहलाती सहलाती अत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है!!

सच मुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँ
पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में
धुएँ के बादलों में
बिलकुल मैं लापता
लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है!!
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
या मेरा जो होता-सा लगता है, होता सा-संभव है
सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभाव है
अब तक तो जिंदगी में जो कुछ था, जो कुछ है
सहर्ष स्वीकारा है
इसलिए कि जो कुछ मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है!

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या – Saharsh Sweekara Hai Poem Explanation

जिंदगी में जो कुछ है, जो भी है
सहर्ष स्वीकारा है;
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है।

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या: प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि उनके जीवन में मौजूद प्यार ही उन्हें सब सहने कि शक्ति प्रदान करता है, जीवन में अच्छा या बुरा जो भी अनुभव हो, कवि उसे स्वीकार करते हैं। इन्हीं सुख-दुःख के साथ उनकी प्रियतमा ने उन्होंने स्वीकारा है।

गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब
यह
विचार-वैभव सब
दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अनुभव सब
मौलिक है, मौलिक है
इसलिए कि पल पल में
कुछ भी जागृत है अपलक है-
संवेदन तुम्हारा है!!

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या: कवि इस पंक्ति के माध्यम से कहना चाहते हैं कि उन्हें अपने अभाव पूर्ण जीवन पर गर्व है। इस जीवन को जीते हुए, जो भी गहरे चिंतन वैचारिक संपन्नता मिली है, वह सब उनका मौलिक है कहीं से भी कृत्रिम या बनावटी नहीं है। जो भी कुछ कवि ने लिखा है, वह सब सत्य है। अनुभव अच्छा था या बुरा उन्हें नहीं पता लेकिन संवेदना के धरातल पर जो प्रेम मिला, सब उनके प्रेरणा का फल है।

जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है
जितना भी उँड़ेलता हूँ, भरभर फ़िर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुस्काता चाँद ज्यों धरती पर रात भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या: कवि कहते हैं मुझे पता नहीं मेरे और तुम्हारे बीच क्या सम्बंध है, मैं नहीं समझ पा रहा हूँ l मैं जितना अपने मन के भावों को बाहर निकालना चाहता हूं, यें और भी ज्यादा आने लगती हैं। क्या मेरे भीतर भावों का झरना सा है, जो प्रेम से बाहर और भीतर भिगा हुआ है। जब आसमान में चाँद खिलता है, तो उसकी रोशनी धरती पर छाई रहती है। ठीक उसी तरह ही तुम्हारे प्रेम का प्रकाश मेरे ऊपर छाया रहता है।

सच मुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैं
तुम्हें भूल जाने की
दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अन्तर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी मे नहा लूँ मैं
इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित
रहने का रमणीय यह उजेला अब
सहा नहीं जाता है।
नहीं सहा जाता है।

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या: कवि कहते हैं कि मैं तुम्हें भूल जाना चाहता हूं। ऐसा घना अंधेरा जो दक्षिण ध्रुव या अमावस्या की काली रात में ही रहता है। मैं उस काली रात में जागना चाहता हूँ, मैं अपने चहरे से अपने तन से उस पीड़ा को झेलना चाहता हूँ l मैं तुम्हारे प्रेम के प्रकाश से घिरा हुआ हूँ। अब मुझसे ये प्रकाश नहीं सहा जाता।

ममता के बादल कि मंडराती कोमलता-
भीतर पिराती है
कमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह
छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है
बहलाती सहलाती अत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है!!

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या:कवि कहते हैं हे प्रिय मेरे भीतर की कोमलता मुझे डराती है, जब मैं भविष्य के बारे में सोचता हूं, तो मेरा डरा मन छटपटाने लगता है। क्या मेरा भविष्य भीषण होगा, यह कल्पना मेरे मन को डराने लगता है। वह अपने आप को बहलाते हुए कहते हैं कि मेरे जीवन में सब कुछ इस प्रिय के कारण है l उन्हें आत्मीयता से इस प्रकार का जुड़ाव अच्छा नहीं लग रहा है।

सच मुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँ
पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में
धुएँ के बादलों में
बिलकुल मैं लापता
लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है!!
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
या मेरा जो होता-सा लगता है, होता सा-संभव है
सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभाव है
अब तक तो जिंदगी में जो कुछ था, जो कुछ है
सहर्ष स्वीकारा है
इसलिए कि जो कुछ मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है!

सहर्ष स्वीकारा है कविता की व्याख्या: अंतिम पंक्तियों में कवि कहते हैं कि उनको दंड दिया जाय, वे पाताल के अंदर बादलों के धुएँ के अंधकार में खो जाना चाहते हैं l आगे कवि कहते हैं, लेकिन मुझे वहाँ भी तुम्हारा ही सहारा मिलेगा यह मुझे पता है l उनके जीवन का प्यार सब कुछ सहने की शक्ति देता है, क्योंकि मुझ में जो भी कमियां या अच्छाइयां है, तुमनें मुझे सहर्ष स्वीकार किया है।

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