झांसी की रानी कविता – Jhansi Ki Rani Poem in Hindi Summary

CBSE Class 6 Hindi Chapter 10 Jhansi Ki Rani Poem Solution

सुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन परिचय: प्रस्तुत कविता हिंदी भाषा और साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी गई है। इनका जन्म उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद जिले में हुआ था। इन्हें बचपन से ही कविता लिखने का शौक़ था तथा इनकी अधिकतर रचनाएं देश-प्रेम से ओत-प्रोत रहती थीं। वह एक रचनाकार होने के साथ-साथ स्वाधीनता संग्राम में सेनानी भी थीं। उन्होने गाँधीजी के साथ असहयोग आंदोलन में भाग लिया तथा दो बार जेल भी गईं। इसीलिए उनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता की झलक देखने को मिलती है।

झांसी की रानी कविता का सार- Jhansi Ki Rani Poem Summary: प्रस्तुत कविता में कवयित्री ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई द्वारा दिखाए गए अदम्य शौर्य का उल्लेख किया है। उस युद्ध में लक्ष्मीबाई ने अपनी अद्भुत युद्ध कौशल और साहस का परिचय देकर बड़े-बड़े वीर योद्धाओं को भी हैरान कर दिया था। उनकी वीरता और पराक्रम से उनके दुश्मन भी प्रभावित थे। उन्हें बचपन से ही तलवारबाज़ी, घुड़सवारी, तीरंदाजी और निशानेबाज़ी का शौक था।

वह बहुत छोटी उम्र में ही युद्ध-विद्या में पारंगत हो गई थीं। अपने पति की असमय मृत्यु के बाद उन्होंने एक कुशल शासक की तरह झांसी का राजपाट संभाला तथा अपनी अंतिम सांस तक अपने राज्य को बचाने के लिए अंग्रेजों से अत्यंत वीरता से लड़ती रहीं। उनके पराक्रम की प्रशंसा उनके शत्रु भी करते थे।


Ncert Solution for Class 6 Hindi Vasant All Chapters

Chapter 01. वह चिड़िया जो (केदारनाथ अग्रवाल)
Chapter 04. चाँद से थोड़ी-सी गप्पें (शमशेर बहादुर)
Chapter 10. झाँसी की रानी (सुभद्रा कुमारी चौहान)
Chapter 13. मैं सबसे छोटी होऊँ (सुमित्रानन्द पंत)
Chapter 16. वन के मार्ग में (वन के मार्ग में तुलसीदास)


झांसी की रानी कविता अर्थ सहित- Jhansi Ki Rani Poem in Hindi Summary

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झांसी की रानी कविता का अर्थ: प्रथम पद में लेखिका ने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के साहस और बलिदान का वर्णन करते हुए कहा है कि किस तरह उन्होंने गुलाम भारत को आज़ाद करवाने के लिए हर भारतीय के मन में चिंगारी लगा दी थी। रानी लक्ष्मी बाई के साहस से हर भारतवासी जोश से भर उठा और सबके मन में अंग्रेजों को दूर भगाने की भावना पैदा होने लगी। 1857 में उन्होंने जो तलवार उठाई थी यानी अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ी थी, उससे सभी ने अपनी आज़ादी की कीमत पहचानी थी।

कानपुर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झांसी की रानी कविता का अर्थ: झांसी की रानी कविता के इस पद में लेखिका ने कहा है कि कानपुर के नाना साहब ने बचपन में ही रानी लक्ष्मीबाई की अद्भुत प्रतिभा से प्रभावित होकर, उन्हें अपनी मुंह-बोली बहन बना लिया था। नाना साहब उन्हें युद्ध विद्या की शिक्षा भी दिया करते थे। लक्ष्मीबाई बचपन से ही बाकी लड़कियों से अलग थीं। उन्हें गुड्डे-गुड़ियों के बजाय तलवार, कृपाण, तीर और बरछी चलाना अच्छा लगता था।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: झांसी की रानी कविता के इस पद में कवयित्री ने बताया है कि लक्ष्मीबाई व्यूह-रचना, तलवारबाज़ी, लड़ाई का अभ्यास तथा दुर्ग तोड़ना इन सब खेलों में माहिर थीं। मराठाओं की कुलदेवी भवानी उनकी भी पूजनीय थीं। वे वीर होने के साथ-साथ धार्मिक भी थीं।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: झाँसी की रानी कविता के इस पद में कवयित्री ने लक्ष्मीबाई के झांसी के राजा श्री गंगाधर राव के साथ विवाह का उल्लेख किया है। उनकी जोड़ी को शिव-पार्वती और अर्जुन-चित्रा की उपमा दी गई है। उनके आने से झांसी में ख़ुशियाँ और सौभाग्य आ गया था। 

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: इस पद में लक्ष्मीबाई के जीवन के कठिन समय का वर्णन किया गया है, जिसमें उनके पति की असमय मृत्यु के बाद रानी अत्यंत दुखी थीं। उनके कोई संतान भी नहीं थी। वे झांसी को संभालने के लिए बिल्कुल अकेली रह गई थीं।  

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: झाँसी की रानी कविता के इस पद में यह बताया गया है कि झांसी के राजा की असमय मृत्यु के बाद उस समय के अंग्रेज़ अधिकारी डलहौजी को झांसी को हड़पने का अच्छा अवसर मिल गया था। उसने अपनी सेना को अनाथ हो चुकी झांसी पर कब्ज़ा जमाने के लिए भेज दिया था।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: झाँसी की रानी कविता के इस पद में कवयित्री बता रही हैं कि अंग्रेज़ लोग भारत में व्यापारी बनकर आए थे और फिर धीरे-धीरे उन्होने यहां के सभी बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं और रानियों से दया और सहायता की भीख मांगकर, उनका ही राज्य हड़प लिया था। परंतु लक्ष्मीबाई अन्य राजा-रानियों से विपरीत थीं और उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी एक महारानी की तरह झांसी को संभाला।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: इस पद में उन सभी राज्यों की चर्चा की गई है, जिन्हें अंग्रेज़ों द्वारा हड़प लिया गया था, जो कि निम्न हैं – दिल्ली, लखनऊ, बिठुर, नागपुर, उदयपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक, सिंध प्रांत, पंजाब, बंगाल और मद्रास। अर्थात् ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा था, जहां बेईमान अंग्रेज़ों ने अपना अधिकार नहीं जमाया हो। 

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपुर के ज़ेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: इस पद में क्रूर अंग्रेज़ों की निर्लज्जता का वर्णन है कि कैसे वे लोग सभी राजाओं तथा नवाबों की हत्या के बाद, वहां के राज्य तो हड़पते ही थे, साथ ही साथ वे उनकी रानियों और बेगमों की इज़्ज़त से भी खिलवाड़ करते थे। चाहे वह लखनऊ की बेगम हों, या कलकत्ता और नागपुर की रानियां। उनके कपड़े और ज़ेवर तक छीन कर नीलाम कर दिए जाते थे और अब उनका अगला कदम झांसी की ओर था।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: इस पद में बताया गया है कि चाहे वो गरीब हो या अमीर, सभी के मन में अंग्रेज़ों के लिए विद्रोह की चिंगारी धधक रही थी। सभी सैनिक नाना साहब, पेशवा जी के नेतृत्व में युद्ध करने को तैयार थे। साथ में उनकी मुंहबोली बहन लक्ष्मीबाई ने भी हार ना मानकर, उनके साथ अंग्रेज़ों से लड़ने का निर्णय कर लिया था।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: झाँसी की रानी कविता के इस पद में यह बताया गया है कि विद्रोह की चिंगारी देश के हर राज्य से सुलग रही थी, चाहे वो झांसी हो या लखनऊ। दिल्ली, मेरठ, कानपुर तथा पटना राज्यों के राजाओं ने भी इसमें अपना पूरा साथ दिया। साथ ही साथ जबलपुर और कोल्हापुर जैसे बड़े शासकों ने भी सन 1857 की क्रांति में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: इस पद में हमारे स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने और शहीद होने वाले कई बड़े वीरों का उल्लेख किया गया है। नाना धुंधूपंत, तांतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुंवर सिंह, तथा सैनिक अभिराम आदि ऐसे ही वीर और साहसी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने युद्ध में दुश्मनों से जमकर संघर्ष किया था।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: यहां इन सभी वीरों के अलावा वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का परिचय है। झांसी में हुए युद्ध में जब लेफ्टिनेंट वॉकर अंग्रेज़ों की तरफ से युद्ध करने आए, तो उनसे लड़ने के लिए अकेली झांसी की रानी ही काफी थीं। उन्होंने दोनों हाथों में तलवारें लेकर रण-चंडी की तरह वॉकर पर प्रहार किया। इस प्रहार से वो बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया तथा रानी के शौर्य बल से वह भी अचंभित रह गया।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: झाँसी की रानी कविता के इस पद में रानी की वीरता का अद्भुत वर्णन है। कवयित्री ने बताया है कि वे सौ मील घोड़े पर बैठकर अंग्रेज़ों को खदेड़ती हुईं यमुना तट तक ले आईं और अंग्रेज़ वहां रानी से पराजित हुए। परंतु यहां पर उनके घोड़े ने वीरगति प्राप्त कर ली अर्थात वो मर गया। उसके बाद उन्होंने ग्वालियर पर भी अपना अधिकार जमाया, जहां के राजा सिंधिया ने अंग्रेज़ों डर से उनसे मित्रता कर ली थी और अपनी राजधानी को छोड़कर वहां से चले गए थे।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: यहां बताया गया है कि अब जनरल स्मिथ ने सेना की कमान संभाल ली थी। रानी लक्ष्मीबाई का साथ देने के लिए उनकी दो सहेलियाँ काना और मंदरा युद्ध मैदान में उतर गई थीं। इन तीनों ने अपनी वीरता और साहस के दम पर कई अंग्रेज़ सैनिकों की लाशें बिछा दी थी। परंतु तभी पीछे से जनरल ह्यूरोज ने आकर रानी को घेर लिया था और यहीं रानी उसके शिकंजे में फँस गई थीं।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: झाँसी की रानी कविता के इस पद में बताया गया है कि रानी जैसे-तैसे बचते हुए दुश्मनों के बीच से निकल कर बाहर आ ही गई थीं, लेकिन अचानक उनके सामने एक चौड़ा नाला आ गया। उनका घोड़ा नया होने के कारण उसे पार नहीं कर पाया और वहीं अड गया। बस यहीं शत्रुओं ने मौका देखकर अकेली रानी पर कई वार पर वार किए और झांसी की रानी ने यहीं अपनी अंतिम सांस तक लड़ते हुए वीर-गति प्राप्त की।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: यहां रानी की दिव्यता का वर्णन है कि रानी अब परलोक सिधार चुकी थीं, परन्तु उनके चेहरे पर सूरज के जैसी चमक छाई हुई थी। उनकी उम्र केवल तेईस साल थी, इतनी छोटी-सी उम्र में वह एक अवतारी-नारी की तरह आकर हम सभी देशवासियों को जीवन का सही मार्ग दिखा गई थीं। क्रांति की चिंगारी का बीज सही मायनों में उन्होंने ही देशवासियों के मन में बोया था।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी कविता का अर्थ: यहां लेखिका कहती हैं कि रानी का यह बलिदान सभी देशवासी हमेशा याद रखेंगे। चाहे दुश्मन अपनी वीरता का परचम लहरा रहा हो या फिर वो अपनी तोप के गोलों से झांसी को ही मिटा दे, लेकिन झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हमारे मन में हमेशा बसी रहेंगी। चाहे उनका कोई स्मारक ना बने, लेकिन वो वीरता और साहस का एक उदाहरण बनकर हमारे इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर रहेंगी।


Ncert solution for class 6 hindi vasant Chapter 10 Jhansi Ki Rani Poem

झाँसी की रानी कविता प्रश्न – उत्तर :

प्र .  1.1 ‘किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई’
इस पंक्ति में किस घटना की ओर संकेत है?
उत्तर:- यह पंक्ति रानी लक्ष्मीबाई के पति और झांसी के राजा श्री गंगाधर राव की अकाल मृत्यु की ओर संकेत करती है।

1.2 ‘किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई’
काली घटा घिरने की बात क्यों कही गई है?
उत्तर:- इस पंक्ति में काली घटा घिरने की बात इसीलिए कही गई है क्योंकि पति की असमय मृत्यु के बाद रानी के जीवन में घोर अंधेरा और निराशा छा गई थी। साथ ही, कोई संतान ना होने के कारण झांसी पर भी अंग्रेजों का कब्जा हो जाने की आशंका थी।

प्र .2. कविता की दूसरी पंक्ति में भारत को ‘बूढा’ कहकर और उसमें ‘नई जवानी’ आने की बात कहकर सुभद्रा कुमारी चौहान क्या बताना चाहती हैं?
उत्तर :  भारतवर्ष के अंग्रेज़ों के गुलाम होने के कारण सभी वीर अपने आप को असहाय महसूस करने लगे थे, इसी कारण भारत को बूढ़ा कहा गया है। लक्ष्मीबाई के स्वतंत्रता संग्राम में नई जान फूंकने से सभी ओर फिर से उमंग का वातावरण हो गया था। इसीलिए उसे नई जवानी का नाम दिया गया है, क्योंकि लोगों में संघर्ष की भावना फिर से जाग उठी थी।

प्र .3. झाँसी की रानी के जीवन की कहानी अपने शब्दों में लिखो और यह भी बताओ कि उनका बचपन तुम्हारे बचपन से कैसे अलग था?
उत्तर : झांसी की रानी को प्यार से बचपन में छबीली के नाम से बुलाया जाता था। वे अपने पिता की इकलौती संतान थीं। वो कानपुर के नाना साहब की मुंहबोली बहन थीं, उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई को युद्ध कौशल की शिक्षा दी थी।

उनका बचपन हमारे बचपन से इसलिए भिन्न था क्योंकि हम हमारे बचपन में खिलौनों, गुड्डे-गुड़ियों तथा बच्चों वाले खेल खेलते थे, परन्तु लक्ष्मीबाई बचपन से ही तलवारबाज़ी, घुड़सवारी, निशानेबाजी, दुर्ग तोड़ना, सैन्य-व्यूह रचना आदि वीरों जैसे खेल खेलती थीं। वे खिलौनों से नहीं बल्कि हथियारों से खेलती थीं। अतः उनका बचपन बाकी बच्चाें से काफी अलग था।

प्र . 4. सुभद्रा कुमारी चौहान लक्ष्मीबाई को ‘मर्दानी’ क्यों कहती हैं?
उत्तर :- लक्ष्मीबाई महिला होते हुए भी युद्ध के मैदान में अत्यंत वीरता के साथ मर्दों की तरह साहस, निडरता, और बहादुरी से शत्रुओं से लड़ी थीं। उन्होंने युद्ध के दौरान शत्रुओं की नाक में दम कर दिया था और उनके पराक्रम की तारीफ तो अँग्रेज़ भी करते थे। उनके इसी अद्भुत कौशल तथा शौर्य से प्रभावित होकर लेखिका ने उन्हें ‘ मर्दानी ‘ कहा है।

प्र . 5. ‘बरछी’, ‘कृपाण’, ‘कटारी’ उस ज़माने के हथियार थे।
आजकल प्रयोग में लाए जाने वाले हथियारों के नाम लिखो।
उत्तर :- आजकल मिसाइल, परमाणु अस्त्र, अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित तोप, टैंक, बंदूकें, बम, तथा हवाई अस्त्र काम में लिए जाते हैं।

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