Topi Shukla Class 10 Summary | Sanchayan Chapter 3

इस ब्लॉग में हम कक्षा 10 संचयन भाग 2 पाठ 3 टोपी शुक्ला का सारांश (Sanchayan Class 10 Chapter 3 Topi Shukla Summary) पढ़ेंगे।

Topi Shukla Class 10 Summary Sanchayan Chapter 3

टोपी शुक्ला के लेखक राही मासूम रज़ा का परिचय

राही मासूम रज़ा का जन्म 1 सितंबर 1927 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के गंगौली गाँव में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से उर्दू साहित्य में पीएच.डी. करने के बाद उन्होंने कुछ साल तक वहीँ अध्यापन कार्य किया। फिर वे मुंबई चले गए, जहाँ सैकड़ों फ़िल्मों की पटकथा, संवाद और गीत लिखे। प्रसिद्ध धारावाहिक ‘महाभारत’ की पटकथा और संवाद लेखन ने उन्हें इस क्षेत्र में सर्वाधिक ख्याति दिलाई।

राही मासूम रज़ा एक ऐसे कवि-कथाकार थे, जिनके लिए भारतीयता आदमीयत का पर्याय रही। उनके पूरे लेखन में आम हिंदुस्तानी की पीड़ा, दुख-दर्द, उनकी संघर्ष क्षमता की अभिव्यक्ति है। राही ने जनता को बाँटने वाली शक्तियों, राजनीतिक दलों, व्यक्तियों, संस्थाओं का खुला विरोध किया। उन्होंने संकीर्णताओं और अंधविश्वासों, धर्म और राजनीति के स्वार्थी गठजोड़ आदि को भी बेनकाब किया।


राही मासूम रज़ा की प्रमुख कृतियाँ हैं – आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, कटरा बी आर्जू, असंतोष के दिन, नीम का पेड़ (सभी हिंदी उपन्यास); मुहब्बत के सिवा (उर्दू उपन्यास); मैं एक फेरी वाला (कविता संग्रह); नया साल, मौजे गुल : मौजे सबा, रक्से-मय, अजनबी शहर : अजनबी रास्ते (सभी उर्दू कविता संग्रह), अट्ठारह सौ सत्तावन (हिंदी-उर्दू महाकाव्य) और छोटे आदमी की बड़ी कहानी (जीवनी)। राही मासूम रज़ा जी का निधन मार्च 1992 को हुआ।

टोपी शुक्ला पाठ की भूमिका – Topi Shukla Short Summary

टोपी शुक्ला कहानी लेखक राही मासूम रज़ा द्वारा रचित है। इस कहानी में लेखक ने दो अलग-अलग धर्म के परिवारों के बारे में बताया है। इसमें हिन्दू और मुस्लिम धर्म के बीच के प्रेम को कहानी के तीन पात्रों टोपी जो हिन्दू है, मुस्लिम इफ़्फ़न और उसकी दादी के माध्यम से दर्शाया है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने समाज को यह बताया है कि मित्रता कभी भी किसी धर्म की मोहताज़ नहीं होती, बल्कि वह प्रेम का प्रतीक है। बच्चों की भावनाएं जाति, धर्म आदि किसी भी प्रकार के भेद-भाव को नहीं मानती।

टोपी शुक्ला पाठ के पात्रों का परिचय 

1. टोपी : हिंदू धर्म से संबंध, पूरा नाम बलभद्र नारायण, इफ़्फ़न से दोस्ती और उसकी दादी के प्रति स्नेह।

2. इफ़्फ़न : मुस्लिम धर्म से संबंध, पूरा नाम सय्यद जरगाम मुरतुजा, टोपी का सच्चा मित्र।

3. टोपी की दादी : टोपी की दादी का नाम सुभद्रादेवी, स्वभाव से कठोर।

4. इफ़्फ़न की दादी : स्वभाव से कोमल, टोपी और इफ़्फ़न को समझने और प्यार करने वाली।

5. रामदुलारी : टोपी की माताजी, टोपी द्वारा अम्मी शब्द बोलने पर उसकी माँ  से पिटाई होती है

6. बाबूजी : टोपी के पिताजी

7. मुन्नी बाबू  : टोपी का बड़ा भाई।

8. भैरव : टोपी का छोटा भाई।

9. सीता – टोपी के घर की नौकरानी और उसे समझने वाली 

10. इफ़्फ़न की अम्मी – इफ़्फ़न द्वारा शरारत करने पर अपनी अम्मी से पिटाई भी होती थी 

11. इफ़्फ़न के अब्बू – घर को न्यायालय समझकर फैसला सुनाने वाले।

12. नुजहत – इफ़्फ़न की छोटी बहन।

13. बाजी– इफ़्फ़न की बड़ी बहन। 

14. अन्य पात्र – कलेक्टर हरिनाम और उनके तीन लड़के डब्बू, गुड्डू, बिलू।

Sanchayan Chapter 3 Topi Shukla Class 10 Summary – टोपी शुक्ला पाठ का सारांश

लेखक ने कहानी की शुरुआत में कहा है कि वे इफ़्फ़न की कहानी पूरी नहीं सुनाएगा। सिर्फ उतनी ही सुनाएगा, जितनी टोपी की कहानी के लिए उसे जरुरी लग रही है। इस पाठ का मुख्य पात्र टोपी शुक्ला है अर्थात बलभद्र नारायण। उसका मित्र इफ़्फ़न अर्थात सय्यद जरगाम मुरतुज़ा। इफ़्फ़न के बिना शायद टोपी की कहानी अधूरी है, ये दोनों बहुत अच्छे मित्र है।

इफ़्फ़न की दादी

Topi shukla summary: इफ़्फ़न की दादी जी पूरबी क्षेत्र की रहने वाली हैं। जब दादी दस साल की थी, तो उनकी शादी हो गई और वे लखनऊ आ गईं। परंतु जब तक वे जिंदा रही पूरबी ही बोलती थी। उर्दू तो उनके लिए ससुराल की भाषा थी। जब उनके बेटे की शादी के दिन आए, तो वे गाने-बजाने के लिए तरस गईं। क्योंकि इस्लाम के नियमों के अनुसार घर में गाना-बजाना भला कैसे हो सकता था। उनकी शादी भी मौलवी से हुई थी, जो बिल्कुल इसके विरुद्ध थे। दादी का दिल उदास हो गया था।

इफ़्फ़न के जन्म के छठे दिन दादी ने खूब गाना-बजाना किया। इफ़्फ़न की दादी मौलवी नहीं थी, वे एक जमींदार परिवार की बेटी थी, जहाँ वे दूध-घी खाकर बड़ी हुई थी। लेकिन शादी के बाद लखनऊ आकर वे दही के लिए भी तरस गई थी। छोटी-छोटी चीजों के लिए भी उन्हें बहुत सोचना पड़ता था। जब भी वे अपने मायके जाती तो जितना मन होता जी भर के दूध-दही खा लेती थी। फिर लखनऊ वापिस आते ही उन्हें मौलवीन बन जाना पड़ता था।

इफ़्फ़न को अपनी दादी से बहुत ज्यादा प्यार था। उसे प्यार तो अपने अब्बू, अम्मी, बड़ी बाजी, छोटी बहन नुजहत से भी था। लेकिन वह सबसे ज्यादा प्यार अपनी दादी से करता था। इफ़्फ़न की अम्मी तो कभी-कभी उसे डांटती और मारती भी थी। बड़ी बाजी भी उसकी पिटाई कर दिया करती थी और छोटी बहन नुजहत इफ़्फ़न की कापियों पर तस्वीरें बना देती। अब्बू भी कभी-कभी घर को न्यायालय समझकर अपना फैसला सुना देते थे। परिवार में बस एक दादी ही थी, जिन्होंने इफ़्फ़न को कभी डांटा नहीं था। वह रात को भी उसे बहराम डाकुओं, अनार परी, 12 बुर्ज, अमीर हमजा, गुलबकावली, हातिमताई, पंज फुल्ला, रानी की कहानियाँ आदि सुनाया करती थीं।

टोपी शुक्ला का इफ़्फ़न की दादी के प्रति प्रेम

Topi shukla summary: इफ़्फ़न की दादी जी की बोली टोपी को बहुत पसंद थी, उसे भी इफ़्फ़न की दादी की तरह बोलना अच्छा लगता था। टोपी को इफ़्फ़न की दादी और अपनी  माँ की पार्टी की दिखाई देती थी। टोपी की माँ और इफ़्फ़न की दादी की बोली एक जैसी ही थी।

टोपी को अपनी दादी बिल्कुल भी पंसद नहीं थी। उसे अपनी दादी से नफरत थी और उसे उनकी भाषा पंसद नहीं थी। टोपी को अपनी दादी की भाषा और इफ़्फ़न के अब्बू की भाषा एक जैसी लगती थी।

टोपी जब भी इफ़्फ़न के घर जाता था, तो उसकी दादी के ही पास बैठता। टोपी को इफ़्फ़न की दादी का हर एक शब्द शक्कर और तिल के लड्डू की तरह मिट्ठा लगता और आम के रस को सुखाकर बनाई गई मोटी परत की तरह मज़ेदार लगता। इफ़्फ़न की दादी हमेशा टोपी से सबसे पहले उसकी अम्मा का हाल-चाल और अम्मा क्या कर रही हैं, हर बार यही पूछती थी। तो ‘अम्मा’ शब्द टोपी को समझ नहीं आता। उसे बाद में जब यह समझ आया कि ‘अम्मा’ माँ को बोलते हैं, तो वह इस शब्द को बार-बार बोलता रहता था। उसे यह शब्द जैसे किसी गुड की डली की तरह लगता था। टोपी इस शब्द को बार-बार बोलकर इसके मीठे स्वाद का आनंद लेता रहता है।

टोपी शुक्ला के मन में अपनी दादी बदलने का ख्याल आना

Topi shukla summary: एक दिन टोपी को बैंगन का भुर्ता कुछ ज्यादा अच्छा लगा। टोपी की माँ रामदुलारी खाना परोस रही थी, तो टोपी ने कहा ‘अम्मी’ जरा बैंगन का भुर्ता, बस इतना ही कहा था कि ‘अम्मी’ शब्द सुनकर खाने की मेज़ पर बैठे सभी चौंक गए। टोपी की दादी सुभद्रादेवी ने तो उसी वक्त खाना छोड़ दिया और वहाँ से उठकर चली गई। माँ ने उसकी खूब पिटाई की और एक ही बात बार-बार पूछ रही थी कि क्या इफ़्फ़न के घर जाएगा? और वो हाँ ही कहता था।

मुन्नी बाबू और भैरव टोपी के भाई थे। मुन्नी बाबू टोपी का बड़ा भाई था और भैरव छोटा भाई था। दोनों भाई टोपी की पिटाई का तमाशा देखते रहे। जिस वक्त टोपी की पिटाई हो रही थी, उस दौरान मुन्नी बाबू ने एक बात और जोड़ दी। उसके बड़े भाई मुन्नी बाबू ने माँ को कहा कि उसने टोपी को रहीम कबाब जी की दुकान पर कबाब खाते देखा था। लेकिन असल बात तो यह थी कि टोपी ने मुन्नी बाबू को कबाब खाते हुए देखा था। मुन्नी बाबू ने उसे एक इकन्नी रिश्वत भी दी थी, ताकि टोपी घर पर कुछ न बताए।

दूसरे दिन टोपी जब स्कूल गया और उसने स्कूल में इफ़्फ़न को सारी बातें बताई। उस दिन दोनों ही भूगोल शास्त्र की कक्षा को छोड़कर बाहर निकल गए। और पंचम की दुकान से इफ़्फ़न ने केले खरीदे क्योंकि टोपी फल के अलावा बाहर की किसी ओर चीज़ को हाथ नहीं लगाता था। एक दिन टोपी इफ़्फ़न से कहता क्या हम अपनी दादी नहीं बदल सकते। उसकी दादी इफ़्फ़न के घर और इफ़्फ़न की दादी उसके घर आ जाए। इफ़्फ़न कहता है कि अब्बू यह बात कभी नहीं मानेगे।

इफ़्फ़न की दादी का देहांत

Topi shukla summary: जिस समय दोनों यह बात कर रहे थे, उसी समय इफ़्फ़न का नौकर आया और ख़बर दी कि इफ़्फ़न की दादी का देहांत हो गया। जब टोपी इफ़्फ़न के घर गया, तो उसका घर लोगों से भरा हुआ था पर टोपी के लिए दादी का न होना ही उसे अकेला कर रहा था। उसके लिए तो पूरा घर ही खाली था। टोपी का दादी के साथ गहरा संबंध बन गया था। अब इफ़्फ़न और टोपी दोनों दादी के बिना अकेले थे। उनको घर में समझने वाला कोई भी नहीं था। टोपी इफ़्फ़न से कहता है काश! तुम्हारी दादी की जगह मेरी दादी की मृत्यु हो गई होती, तो बहुत अच्छा होता।

इफ़्फ़न के पिताजी का ट्रांसफर

Topi shukla summary: लेखक कहते हैं टोपी ने दस अक्टूबर सन् पैंतालीस को कसम खाई थी कि वह अब ऐसे किसी भी लड़के से दोस्ती नहीं करेगा, जिसके पिता जी कोई ऐसी नौकरी करते हो, जिसमें ट्रांसफर होता रहता है। दस अक्टूबर सन् पैंतालीस के दिन इफ़्फ़न के पिता जी इफ़्फ़न को लेकर मुरादाबाद चले गए थे। टोपी दादी के मरने के बाद अकेला तो महसूस कर ही रहा था और अब इफ़्फ़न के चले जाने के बाद बहुत अकेला हो गया था।

कलेक्टर हरनाम सिंह के बच्चों का टोपी के साथ बर्ताव

Topi shukla summary: इफ़्फ़न के पिताजी कलेक्टर थे। उनका ट्रांसफर हो जाने के कारण उनके स्थान पर नए कलेक्टर हरनाम सिंह आए। वे उसी बँगले में रहने लगे जिसमें इफ़्फ़न का परिवार रहता था। दूसरे कलेक्टर ठाकुर हरिनाम सिंह के तीनों लड़कों में से टोपी का कोई दोस्त नहीं बन सका। डब्बू सबसे छोटा था और बीलू सबसे बड़ा था। गुड्डू था तो बराबर परंतु अंग्रेजी ही बोलता था।

जब इफ़्फ़न को याद करके टोपी उस बँगले में पहुँचा तो, माली और चपरासी टोपी को पहचानते थे, इसलिए चौकीदार ने उसे अंदर जाने दिया। वहाँ नए कलेक्टर के तीनों बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। उन्होंने टोपी से गलत ढंग से बातचीत ही नहीं की बल्कि उसकी पिटाई भी की। उन्होंने टोपी के पीछे अपना कुत्ता भी छोड़ दिया जिसके कारण टोपी को सात सुइयाँ लगवानी पड़ीं।

टोपी शुक्ला का नौकरानी सीता से लगाव

Topi shukla summary: टोपी के में बस एक बूढ़ी नौकरानी सीता ही थी, जो उसका दुःख दर्द समझती थी। तो अब इफ्फ़न के जाने के बाद  सीता के साथ ही समय गुजारता था। जब भी घर में टोपी को कोई डांटता था तो सीता ही उसके आंसू पोंछती थी। टोपी की घर में दादी और अन्य सदस्य के साथ बहस होने पर भी वही उसको समझाती थी।

टोपी शुक्ला और दादी की बहस

Topi shukla summary: ठण्ड के दिन शुरू हो गए। टोपी के दोनों भाई मुन्नी बाबू और भैरव को नया कोट मिला। टोपी को मुन्नी बाबू का पुराना कोट देने को कहा गया। मुन्नी बाबू के लिए जब कोट बनकर आया था तो उसे वो कोट पसंद नहीं आया था। टोपी मुन्नी बाबू से छोटा था तो उसे कोट दिया गया लेकिन टोपी को भी वो कोट पंसद नहीं आया इसलिए टोपी ने वो कोट दूसरी नौकरानी केतकी के बेटे को दे दिया था। इसलिए टोपी को कोट नहीं मिला और वह अब ऐसे ही ठंड में रहेगा। इस पर दादी और टोपी के बीच बहस भी बहुत हुई थी और दादी ने पूरा घर अपने सिर पर उठा लिया। जब टोपी को उसकी माँ ने दादी को उलटा जवाब देते देखा, तो टोपी को उसकी माँ पीटने लगी। तभी बूढ़ी नौकरानी सीता टोपी को समझाने लगी कि अब वह दसवीं कक्षा में पहुँच गया है, उसे अपनी दादी से इस तरह बात नहीं करनी चाहिए। परंतु टोपी के लिए दसवीं कक्षा में पहुंचना आसान नहीं था।

टोपी शुक्ला का थर्ड डिवीज़न से दसवीं पास करना

Topi shukla summary: दसवीं कक्षा में पहुँचने के लिए टोपी को बहुत मेहनत करनी पड़ी थी। जब वह पहली बार फ़ेल हुआ तो मुन्नी बाबू इंटरमीडिएट और भैरव छठी कक्षा में प्रथम आए। तब वह बहुत रोया। टोपी पढ़ाई में तेज़ था, परंतु उसे कोई पढ़ने ही नहीं देता था। जब भी टोपी पढ़ाई करने बैठता, तो उसके बड़े भाई मुन्नी बाबू को कोई काम याद आ जाता या उसकी माँ को कोई ऐसी चीज़ मँगवानी पड़ जाती थी, जो वह नौकरों से नहीं मंगवा सकती थी। टोपी का छोटा भाई उसकी किताबों के पेज फाड़कर जहाज़ बनाने लग जाता था।

दूसरे साल टोपी को टाइफाइड हो गया। जिस कारण वह पढ़ाई नहीं कर पाया और फ़ेल हो गया। तीसरे साल पास तो हो गया, परंतु थर्ड डिवीज़न से पास हुआ। टोपी के सभी दोस्त दसवीं में थे और वह नौवीं कक्षा में ही रह गया। अपनी कक्षा में पढ़ने वालों के साथ उसकी किसी से भी दोस्ती नहीं थी। वह जब भी कक्षा में बैठता, तो उसे बड़ा अजीब लगता था। टोपी ने किसी न किसी तरह इस साल को झेल लिया परंतु सन् इक्क्यावन में उसे नौवी में बैठना पड़ा। वो किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था। उसके दसवीं के दोस्त भी आगे बढ़ चुके थे।

टोपी की कक्षा के एक लड़के ने उससे पूछ ही लिया कि वह उन लोगों के साथ क्यों खेलता है? उसे तो आठवी कक्षा के बच्चों के साथ दोस्ती करनी चाहिए। क्योंकि वे लोग तो आगे दसवीं में निकल जाएँगे। नौवीं में तो पिछली कक्षा के बच्चे ही आने वाले हैं। यह बात टोपी को बहुत बुरी लगी उसे ऐसा लगा जैसे ये बात उसके दिल के आर-पार हो गई हो। फिर उसने उसी समय कसम खाई कि अब उसे चाहे टाइफाइड ही क्यों न हो जाए, वह पास होकर ही दिखाएगा।

परंतु साल के बीच में ही चुनाव आ गए। टोपी के पिता डॉक्टर भृगु नारायण नीले तेल वाले चुनाव लड़ने के लिए खड़े हो गए। उसके घर में हमेशा लोगों का आना-जाना लगा रहता। ऐसे में टोपी का पढ़ना-लिखना मुश्किल हो रहा था। परंतु जब टोपी के पिता जी  चुनाव हार गए। फिर घर में थोड़ी शांति हुई। टोपी की परीक्षा को अब ज्यादा समय नहीं रह गया और वह पढ़ाई करने में जुट गया। परंतु जैसा वातावरण टोपी के घर में बना हुआ था, ऐसे माहौल में कोई भी नहीं पढ़ सकता था। इसलिए टोपी का पास हो जाना ही काफी था। जब टोपी एक ही कक्षा में दो साल लगाने के बाद पास हुआ, तो उसकी दादी ने कहा वाह! टोपी को भगवान नज़रबंद से बचाए। तीसरे साल भी थर्ड डिवीज़न से पास तो हो गए।

टोपी शुक्ला कहानी का उद्देश्य – Topi Shukla story lesson

लेखक राही मासूम रज़ा इस कहानी के माध्यम से हमें  यह बताने का प्रयास  किया है कि प्रेम धर्म और उम्र के बंधन से ऊपर है। बचपन में बच्चों को जहाँ से भी अपनापन और स्नेह मिलता है, वह वहीँ रहना चाहता है। वह चाहे किसी भी उम्र का व्यक्ति हो या किसी भी धर्म से हो। हमें इंसानियत के बीच धर्म को नहीं लाना चाहिए। हमें किसी भी धर्म या जाति के प्रति घृणा नहीं रखनी चाहिए। समाज में हमें धार्मिक एकता बनाए रखनी चाहिए। 

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