Sapno Ke Se Din Class 10 Summary – सपनों के से दिन पाठ का सारांश

इस ब्लॉग में हम कक्षा 10 संचयन भाग 2 के पाठ 2 सपनों के से दिन का सारांश (Sanchayan Chapter 2 Sapno Ke Se Din Class 10 Summary) पढ़ने वाले हैं।

Sapno Ke Se Din Class 10 Summary – सपनों के से दिन पाठ का सारांश

सपनों के से दिन के लेखक गुरदयाल सिंह का परिचय

पंजाब के जैतो कस्बे में 10 जनवरी 1933 को एक साधारण दस्तकार परिवार में जन्मे गुरदयाल सिंह ने बचपन में कीलों, हथौड़ों से काम लेते हुए, शिक्षा पूरी की और कलम पकड़ी। 1954 से 1970 तक स्कूल में अध्यापक रहे। पहली कहानी 1957 में पंच दरिया पत्रिका में प्रकाशित हुई जब कॉलेज में प्राध्यापक हुए, तो गुरदयाल सिंह जी को अपने ही उपन्यास पढ़ने का मौका मिला। अंत में यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद से अवकाश ग्रहण किया।


गुरदयाल सिंह ग्रामीण परिवेश और भावबोध के लेखक के रूप में जाने जाते हैं। बड़े सहज रूप से वे अपने पात्रों का चयन खेतिहर मजदूरों, पिछड़े और दलित वर्ग के लोगों के बीच से करते हैं। जो सदियों से अपने समाज की उस दूषित व्यवस्था के शिकार हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनकी शारीरिक हड्डियों को ही नहीं गलाती रही है, बल्कि उनकी पूरी मानसिकता को दीन, हीन और बेबस बनाए हुए है।

पंजाबी भाषा में उल्लेखनीय योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित गुरदयाल सिंह को अपने लेखन के लिए साहित्य अकादमी, सोवियत लैंड नेहरू सम्मान, पंजाब की साहित्य अकादमी सहित कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ है। उन्होंने बतौर लेखक कई देशों की यात्रा भी की।

उन्होंने अब तक नौ उपन्यास, दस कहानी संग्रह, एक नाटक, एक एकांकी संग्रह, बाल साहित्य की दस पुस्तकें और विविध गद्य की दो पुस्तकों की रचना की है। गुरदयाल सिंह की प्रमुख कृतियाँ हैं- माढ़ी का दीवा, अथ-चाँदनी रात, पांचवां पहर, सब देश पराया, साँझ-सबेरे और (आत्मकथा ) क्या जानूँ मैं कौन? गुरदयाल सिंह का निधन 16 अगस्त 2016 को हुआ।

सपनों के से दिन की भूमिका – Sapno Ke Se Din Short Summary

‘सपनों के-से दिन’ कहानी गुरदयाल सिंह जी द्वारा रचित है। इस कहानी में लेखक ने अपने बचपन के माध्यम से स्कूल के वातावरण को दर्शाया है। जहाँ एक तरफ बच्चे खुशी-खुशी स्कूल जाते हैं। वहीँ कभी मास्टर के डर से स्कूल जाने से भी डरते हैं। इसमें दो शिक्षकों के व्यवहार के बारे में बताया गया है। हेडमास्टर शर्मा जी जो बहुत शांत स्वभाव के हैं और दूसरे प्रीतमचंद कठोर स्वभाव के हैं, जो बच्चों को अनुशासन में रहना सिखाते थे।

सपनों के से दिन पाठ के पात्रों का परिचय 

1. लेखक :  पाठ के मुख्य पात्र और उनके  बचपन के दिनों की शरारतें, खेलना-कूदना इत्यादि का वर्णन

2. लेखक की माँ : लेखक द्वारा शरारतें करने पर माँ से पिटाई।

3. लेखक की नानी : लेखक का स्कूल की छुट्टीयों में नानी के घर जाकर मजे से खाना-पीना और खूब खेलना।

4. मास्टर प्रीतमचंद : लेखक के स्कूल में पीटी अध्यापक, बच्चों के साथ कठोर स्वभाव के कारण स्कूल से बर्खास्त कर दिया जाता है।

5. हेडमास्टर शर्मा जी : लेखक के स्कूल में अंग्रेजी के अध्यापक और स्वभाव से शांत।

6. लेखक के मित्र : जिनके साथ लेखक बचपन में पूरा दिन खेल- कूद करते थे। सभी बच्चे अलग-अलग प्रदेश से थे और सभी अलग भाषा  बोलते थे।

7. ओमा : स्कूल का काम न करने से बेहतर अध्यापक की पिटाई को सच्चा- सौदा समझता था 

Sapno Ke Se Din Class 10 Summary – सपनों के से दिन पाठ का सारांश

लेखक का बचपन

इस कहानी में लेखक अपने बचपन के दिनों के बारे में बता रहे हैं कि किस तरह से वे जब अपने दोस्तों के साथ खेलने जाते थे, तो उनकी क्या स्थिति होती थी। नंगे पाँव, फटी-मैली सी कच्छी और टूटे बटनों वाले कई जगह से फटे कुर्ते और बिखरे बाल होते थे। लेखक कहते हैं कि जब खेलते-कूदते, भागते-दौड़ते चोट लगती, तब हम ज़ख्मी हो जाते, तो सभी की माँ- बहनें हम पर तरस खाने की जगह मार-पिटाई करती थीं।

लेखक बताते हैं कि मेरे साथ खेलने वाले अधिकतर साथी हमारे ही जैसे परिवारों के हुआ करते थे। सभी निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से थे, हमारी आदतें भी कुछ मिलती-जुलती थी। हममें से कुछ बच्चे हरियाणा और राजस्थान से आकर मंडी में व्यापार या दुकानदारी करने आए परिवारों में से थे। उनके कुछ शब्द सुनकर हमें हँसी आ जाती थी। लेकिन जब हम खेलते थे, तब एक-दूसरे के व्यवहार से बखूबी समझ जाते थे।

लेखक का स्कूल के प्रति डर

हममें से कोई भी ऐसा नहीं था, जिसे स्कूल कैद न लगता हो। दूसरी तरफ जब हम नई श्रेणी में जाते, तो बड़े होने के एहसास से खुश भी होते थे, परंतु साथ में डर भी लगता था कि मास्टरों से पहले से भी अधिक मार पड़ेगी। अब तक जो बात अच्छी तरह याद है, वह स्कूल की छुट्टियों के पहले और उसके बाद का फर्क।

स्कूल की छुट्टियों में जब नानी के घर जाते, तो पहले दो-तीन सप्ताह तो ऐसे ही निकल जाते थे। नानी के घर खूब दूध-दही और मक्खन कहने को मिलता था और नानी के घर के पास जो तालाब था वहाँ दोपहर तक नहाते रहते और जो जी में आता तो नानी से माँग लेते थे। जब छुट्टियाँ खत्म होने वाली होती, तो डर बढ़ने लगता था। मास्टर जी ने जो छुट्टियों का काम दिया था, उसका हिसाब लगाने लगते और स्कूल की पिटाई का डर और बढ़ने लगता था।

ऐसे समय में हमारा सबसे बड़ा नेता ओमा हुआ करता, जो मास्टरों की मार को सस्ता-सौदा समझता था। फिर वे सोचते कि किस तरह से काम पूरा किया जाए, दिन-रात एक करके काम पूरा करने की कोशिश करते पर सफल नहीं होते और मास्टरों से पीटाई खा लेते थे।

लेखक का स्कूल नापसंद करना और स्काउटिंग के प्रति लगाव

हमारा स्कूल बहुत छोटा था। इसमें छोटे-छोटे नौ कमरे थे, जो अंग्रेजी के ‘एच’ की तरह बने हुए थे, दाईं ओर पहला कमरा हेडमास्टर श्री मदनमोहन शर्मा जी का था। जिसके दरवाज़े के आगे हमेशा पर्दा लगा रहता था। स्कूल में प्रार्थना के समय वे बाहर आते थे और सीधे खड़ी कतार में लड़कों को देखकर खुश हो जाते थे। स्कूल के सारे अध्यापक भी उनके पीछे कतार में खड़े हो जाते थे, केवल मास्टर प्रीतमचंद जो पीटी के अध्यापक थे। वे लड़कों को भी देखते की कोई कतार से बाहर तो नहीं है। वे बच्चों को दंड देते थे और इसके विपरीत हमारे हेडमास्टर शर्मा जी थे, वे बिल्कुल शांत स्वभाव के थे। वे आठवीं और पाँचवी श्रेणी को अंग्रेजी खुद पढ़ाया करते थे।

लेखक का बिना रोए- चिल्लाये स्कूल कभी जाना नहीं होता था, परंतु कभी-कभी स्कूल में ऐसा भी पल हुआ करता था जिसके चलते स्कूल अच्छा भी लगता था। जब पीटी सर स्काउटिंग का अभ्यास कराते समय रंग-बिरंगी झंडियाँ हाथ में पकड़ाकर वन टू थ्री करते और झंडियाँ ऊपर-नीचे दाएँ-बाएँ लहराते तो बहुत ही मजा आता था। हमारे द्वारा अच्छा करने पर वे हमें ‘शाबाशी’ भी दिया करते थे।

लेखक के समय की सामाजिक स्थिति

हर साल अगली कक्षा में प्रवेश करते समय मुझे पुरानी किताबें मिला करती थी इसीलिए अगली कक्षा में जाने का शौक भी नहीं होता था, लेखक के घर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी पर वे पढ़ना चाहते थे। उस समय जब और बच्चे पढ़ना नहीं चाहते थे, तो उनके माता-पिता ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। वे सोचते थे आगे चलकर वो करेगा ही क्या?, जो हमारा काम है, वही तो उसे संभालना है बस हिसाब-किताब ही आ जाए तो काफी है। लेखक का परिवार भी बड़ा था और वे पढ़ना भी चाहते थे। इसीलिए मास्टर जी उन्हें हर साल एक कक्षा आगे की किताब पकड़ा देते थे।

दूसरे विश्वयुद्ध का समय था। लोगों को फ़ौज में शामिल होने के लिए नौटंकी और गाने के माध्यम से बहादुरी का दृश्य दिखाकर उन्हें आकर्षित किया करते थे। कभी-कभी हमें भी महसूस होता कि हम भी फ़ौजी जवानों से कम नहीं, धोबी की धुली वर्दी और पालिश किए बूट और जुराबों को पहनकर जब हम स्काउटिंग की परेड करते, तो लगता हम फ़ौजी ही हैं।

मास्टर प्रीतमचंद का व्यक्तित्व

हमने मास्टर प्रीतमचंद को कभी भी मुस्कुराते नहीं देखा, उनसे सभी डरते थे और नफरत भी करते थे। मास्टर प्रीतमचंद बहुत सख्त सजा देते थे। वे चौथी श्रेणी में फ़ारसी पढ़ाते थे। एक दिन उन्होंने सभी बच्चों को शब्द-रूप याद करने को कहा परंतु कोई भी बच्चा पूरी तरह याद नहीं कर पाया। मास्टर जी ने सभी बच्चों को टांगों के पीछे से बाँहें निकालकर कान पकड़ने और पीठ ऊँची करने के लिए कहा, कई बच्चे सहन न कर सके और तीन-चार मिनट के बाद बारी-बारी से गिरने लगे।

तभी उसी वक्त हेड मास्टर शर्मा उधर से निकले, उन्होंने पीटी सर को बच्चों से इतना बुरा व्यवहार करते देखा, तो उन्हें सहन नहीं हुआ। उन्होंने पीटी सर को बहुत डांटा और उनकी शिकायत डायरेक्टर को लिखकर भेज दी। जब तक ऊपर से आदेश नहीं आ जाता तब तक पीटी सर को स्कूल में आने की अनुमति नहीं थी।

बाद में पीटी सर अपने घर में आराम से रहते थे। उन्हें पक्षियों से बहुत प्यार था। उन्होंने घर में दो तोते रखे हुए थे। वे उन्हें बादाम भी खिलाते थे और उनसे बातें भी किया करते थे। जब बच्चों ने पीटी सर को ऐसे देखा, तो उन्हें चमत्कार-सा लगा कि जो मास्टर स्कूल में बच्चों को मारते-पिटते थे, वे अपने तोतों के साथ आखिर कैसे अच्छे से बातें कर सकते हैं।

सपनों के से दिन कहानी का उद्देश्य – Sapno Ke Se Din Lesson

इस कहानी के माध्यम से लेखक हमें यह बताना चाहते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के भविष्य का विकास करने के साथ ही उनमें नैतिक मूल्यों का विकास करना भी है। और शिक्षकों को बच्चों के साथ मार-पिटाई के स्थान पर प्यार से पेश आना चाहिए। अगर स्कूल में बच्चे काम समय पर नहीं करते, तो उसका कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए। बच्चों को खेलने- कूदने के साथ-साथ पढ़ाई को भी महत्व देना चाहिए।

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