Table of content

  1. रघुवीर सहाय का जीवन परिचय
  2. कैमरे में बंद अपाहिज कविता का सारांश 
  3. कैमरे में बंद अपाहिज कविता 
  4. कैमरे में बंद अपाहिज कविता की व्याख्या
  5. कैमरे में बंद अपाहिज प्रश्न अभ्यास

रघुवीर सहाय का जीवन परिचय – Raghuveer Sahay ka Jeevan Parichay

रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसम्बर 1929 को तथा मृत्यु 30 दिसम्बर 1990 को हुई थी l वे हिंदी के साहित्यकार वा पत्राकार थे l इनका जन्म लखनऊ में हुआ था, इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम. . किया था l

इन्होंने पत्रकारिता की शुरूआत दैनिक नव जीवन से की l जिसमें वे उप संपादन तथा संस्कृति संवाददाता के पद पे रहे l जिसके बाद वे दिल्ली आगए l कुछ दिन तक प्रतीक के सम्पादक रहे और फिर आकाश वाणी के समाचार विभाग में उप सम्पादक रहे l 

इनके साहित्य में पत्रकारिता की साफ झलक मिलती है l इनकी कविताओं में 60 के दशक के बाद के भारत की तस्वीर समग्र रूप से दिखती है l इनकी कविताओं में मुख्य रूप से सामाजिक और लोकतांत्रिक में व्याप्त असमानता, शोषण, हत्या, आत्महत्या, विषमता, दासता, राजनीतिक संप्रभुता, जाति धर्म से बंटते समाज की कोइ जगह नहीं है l

इनकी मुख्य कृतियाँ, दूसरा सप्तक, सीढियों पर धूप में, आत्महत्या के विरूद्ध, हंसो जल्दी हंसो, रास्ता इधर से है l भाषा रूपांतरण, बाराह हंगरी कि कहानियां, विवेकानंद इत्यादि हैं l लोग भूल गए हैं, के लिए इनको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था l

कैमरे में बंद अपाहिज कविता का सारांश- CAMRE ME BAND APAHIJ POEM SHORT SUMMARY 

कैमरे में बंद अपाहिज कविता एक ऐसी कविता है जिसमें दूरदर्शन के संचालक गण अपने आप को बहुत ही ज्यादा शक्तिशाली बताते हैं एवं औरों को वह कमजोर समझते हैं। इतना ही नहीं यह दूरदर्शन के संचालक विकलांगों से जाकर पूछते हैं कि क्या आप सचमुच अपाहिज हैं और यदि आप अपाहिज है तो क्यों है? कैमरे में बंद अपाहिज कविता “लोग भूल गए हैं” काव्य संग्रह से लिया गया है। 

यह एक व्यंगात्मक कविता है। दूरदर्शन के संचालक जिस तरीके से अपाहिज लोगों के समक्ष जाकर उनके दुख का मजाक उड़ाते हैं। उनके विकलांगता पर प्रश्न करते हैं, ऐसे प्रश्न विकलांग लोगों को और भी कमजोर बना देते हैं। यह कविता इन्हीं सब बातों पर आधारित है।

कैमरे में बंद अपाहिज कविता- CAMRE ME BAND APAHIJ POEM 

हम दूरदर्शन पर बोलेंगे
हम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएँगे
एक बंद कमरे में 

उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा
देता है?
(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा-बड़)
हाँ तो बताइए आपका दुख क्या हैं
जल्दी बताइए वह दुख बताइए
बता नहीं पाएगा।

सोचिए
बताइए
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता हैं
कैसा
यानी कैसा लगता हैं 
(हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?)
सोचिए
बताइए
थोड़ी कोशिश करिए
(यह अवसर खो देंगे?)

आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे
इंतजार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का
करते हैं?
(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)

फिर हम परदे पर दिखलाएंगे
फूली हुई आँख काँ एक बड़ी तसवीर
बहुत बड़ी तसवीर
और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी
(आशा हैं आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे)
एक और कोशिश
दर्शक
धीरज रखिए
देखिए
हमें दोनों  एक संग रुलाने हैं

आप और वह दोनों
(कैमरा
बस करो
नहीं हुआ
रहने दो
परदे पर वक्त की कीमत है)
अब मुसकुराएँगे हम
आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम
(बस थोड़ी ही कसर रह गई)
धन्यवाद!

 कैमरे में बंद अपाहिज कविता की व्याख्या- CAMRE ME BAND APAHIJ POEM LINE BY LINE EXPLANATION

हम दूरदर्शन पर बोलेंगे
हम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएँगे
एक बंद कमरे में

उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा
देता है?
(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा-बड़)
हाँ तो बताइए आपका दुख क्या हैं
जल्दी बताइए वह दुख बताइए
बता नहीं पाएगा।

व्याख्या- प्रस्तुत काव्य पंक्तियां रघुवीर सहाय की कविता कैमरे में बंद अपाहिज शीर्षक से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने संवेदनहीनता का चित्रण किया है, जो मीडिया द्वारा किया जाता है। इस कविता में कवि के अनुसार मीडिया वाले औरों के दुख को भी अपने व्यापार का माध्यम बनाने से थोड़ा सा भी नहीं हिचकते हैं, उन्हें सिर्फ पैसे कमाने से मतलब है और इसी बात पर व्यंग्य करते हुए कवि ने इस कविता को लिखा है।

कवि कहते हैं कि मीडिया के लोग अपने आपको बहुत ज्यादा शक्तिशाली मानते हैं और वही वह अपने समक्ष औरों को बहुत ही कमजोर मानते हैं। यह मीडिया वाले विकलांगों के पास जाकर उनसे प्रश्न पूछते हैं कि क्या आप अपाहिज हैं? यदि हां तो क्यों अपाहिज है, क्या उनका यह अपाहिज होना उनको दुख देता है?

वह अपाहिज से इतने प्रश्न पूछते हैं कि वे अपाहिज उन प्रश्नों का उत्तर बिल्कुल भी नहीं दे पाते और वह चुप हो जाते हैं और जब वह चुप हो जाते हैं तभी यह मीडिया प्रवक्ता अपने कैमरामैन को निर्देश देते हुए कहते हैं कि इन विकलांगों की तस्वीर को हमारे स्क्रीन पर बहुत बड़ा-बड़ा करके दिखाओ और ऐसा करके वह उन लोगों का अपमान करते हैं, उनको जिल्लत देते हैं उनका  मजाक उड़ाते हैं।

सोचिए
बताइए
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता हैं
कैसा
यानी कैसा लगता हैं 
(हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?)
सोचिए
बताइए
थोड़ी कोशिश करिए
(यह अवसर खो देंगे?)
आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे
इंतजार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का
करते हैं?
(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)

व्याख्या- आगे बढ़ते हुए कवि कहते हैं कि यह मीडिया के प्रवक्ता इतने क्रूर प्रकृति के होते हैं कि वह जानबूझकर अपाहिज लोगों से बेतुके सवाल पूछते हैं ताकि वे सवालों का उत्तर ना दे पाए। 

जब सचमुच में यह अपाहिज उन सवालों का उत्तर नहीं दे पाते हैं, तब यह मीडिया के प्रवक्ता खुद ही उन सवालों के जवाब देना आरंभ कर देते हैं।

अपना नाम कमाने के लिए यह मीडिया के प्रवक्ता अपाहिज लोगों को कहते हैं कि यदि आप अपने पीड़ा को हमारे समक्ष नहीं बता पाएंगे, तो लोग कभी नहीं जान पाएंगे आपके दुख एवं दर्द को उन्हें जानबूझकर उनके कमजोरी पर चोट पहुंचाते हैं और उन्हें रोने पर मजबूर कर देते हैं। कवि ने ऐसा कहकर समाज पर भी कटाक्ष किया है कि समाज के लोग अपना मान- सम्मान पाने के लिए किसी को भी दर्द में रख सकते हैं।

फिर हम परदे पर दिखलाएंगे
फूली हुई आँख काँ एक बड़ी तसवीर
बहुत बड़ी तसवीर
और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी
(आशा हैं आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे)
एक और कोशिश
दर्शक
धीरज रखिए
देखिए
हमें दोनों  एक संग रुलाने हैं

आप और वह दोनों
(कैमरा
बस करो
नहीं हुआ
रहने दो
परदे पर वक्त की कीमत है)
अब मुसकुराएँगे हम
आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम
(बस थोड़ी ही कसर रह गई)
धन्यवाद!

व्याख्या- आगे बढ़ते हुए कवि कहते हैं कि मीडिया प्रभारी प्रश्न पूछ कर अपाहिज लोगों का मानसिक शोषण करते हैं। जब यह कमजोर लोग रोते हैं, तब यह मीडिया प्रवक्ता अपने टीवी स्क्रीन के पर्दों पर दिखाने के लिए उनके तस्वीरों को खींचते हैं, ताकि पूरा समाज उनका मजाक उड़ा सके।

ऐसा करके वह अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाते हैं, समाज के लोगों की भावनाओं के साथ खेलते हैं और अंत में यह लोग अपना कैमरा बंद कर देते हैं और बंद होने से पूर्व वह यह घोषणा करते हैं कि आप सभी दर्शक समाज के जिस उद्देश्य के लिए यह कार्यक्रम देख रहे थे वह कार्यक्रम अब समाप्त हो चुका है।

बस हमारे कार्यक्रम में यह एक त्रुटि रह गई है कि हम आप लोगों को अच्छे से रुला नहीं पाए फिर भी यह कार्यक्रम देखने के लिए आप सभी का धन्यवाद।

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कैमरे में बंद अपाहिज कविता की व्याख्या
कैमरे में बंद अपाहिज कविता का मूल भाव
कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता का सार
कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता का उद्देश्य
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