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सत्य कविता प्रश्न अभ्यास– Satya Poem Explanation

प्रश्न 1. सत्य क्या पुकारने से मिल सकता है? युधिष्ठिर विदुर को क्यों पुकार रहे हैं- महाभारत के प्रसंग से सत्य के अर्थ खोलें।

उत्तर- सत्य अगर आवाज लगाने से मिल जाता, तो शायद आज चारों तरफ झूठ नहीं फैला होता। कविता के अनुसार सत्य को बुलाने से नहीं बल्कि सत्य बोलने से सत्य का पता मिलता है।

सत्य को पाने के लिए संघर्ष करने पड़ते हैं, जैसे महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर ने किया था। जिस तरह युधिष्ठिर ने अपने संपूर्ण जीवन में केवल सत्य ही कहा था और सत्य को ही अपना धर्म समझा था और शायद इन्हीं कारणों की वजह से उन्हें धर्मराज भी कहा जाता था।

सत्य बिकते नहीं है, सत्य हर मनुष्य के अंदर व्याप्त होता है। बस उसे पहचानने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2. सत्य का दिखना और ओझल होना से कवि का क्या तात्पर्य है?

उत्तर- सत्य सभी व्यक्ति के अंदर विराजमान होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर व्यक्ति सत्य को महसूस नहीं कर पाता। सत्यता ओझल हो जाती है जब झूठ सत्य के सामने भारी हो जाता है।

सत्य अगर सही तरीके से बोला जाए तो सत्य सत्य है, अगर सत्य को लोग तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं, तो सत्य ओझल हो जाता है। सत्य हमेशा उनको ही दिखता है, जो सत्य को अपना सबकुछ मान लेते हैं। अर्थात हमेशा सच्चाई के पथ पर चलते है।

प्रश्न 3. सत्य और संकल्प के अंतर्संबंध पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर- एक भक्त और भगवान के बीच कैसा संबंध होता है, ठीक वैसा ही संबंध सत्य और संकल्प के मध्य होता है। भक्ति के मार्ग से होकर ही मनुष्य भगवान को प्राप्त करता है। ठीक वैसे ही सत्य के मार्ग पर चलने के लिए संकल्प का होना अति आवश्यक है। बिना किसी संकल्प के हम किसी भी मार्ग पर चल नहीं सकते हैं।

सत्य और संकल्प का आपस में गहरा संबंध है। सत्य भी उनका ही साथ देता है, जो हमेशा सच्चाई के पथ पर अग्रसर रहते हैं। झूठ बोलने वालों के जीवन में सत्य का कोई मोल नहीं है। सत्य उनके जीवन में कभी प्रवेश भी नहीं करता है।

प्रश्न 4. ‘युधिष्ठिर जैसा संकल्प’ से क्या अभिप्राय है?

उत्तर- युधिष्ठिर संपूर्ण महाभारत में एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने हमेशा सत्य का साथ दिया। सत्य ही उनके जीवन का महत्वपूर्ण आधार था। युधिष्ठिर इतने सत्यवादी थे कि उनके समक्ष विदुर तक को भी झुकना पड़ा।

युधिष्ठिर के जीवन में अनेक कठिनाइयां आईं, मगर उन कठिनाई के परिस्थितियों में भी उन्होंने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक सत्य का ही साथ दिया। इसलिए कवी सत्य कविता के माध्यम से युधिष्ठिर जैसा संकल्प करने के लिए कहते हैं।

प्रश्न 5. कविता मैं बारबार प्रयुक्त ‘हम’ कौन हैं और उसकी चिंता क्या है?

उत्तर- कविता में बार बार प्रयुक्त होने वाले हम वह व्यक्ति है, जो हमेशा झूठ बोलते हैं और सत्य को ढूंढने के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं।

प्रश्न 6. सत्य की राह पर चल। अगर अपना भला चाहता है तो सच्चाई को पकड़।- इन पंक्तियों के प्रकाश में कविता का मर्म खोलिए।

उत्तर- आज जिस समाज में हम सभी रहते हैं, वह समाज और धर्म के पथ पर अग्रसर हो रहा है। आज सच्चाई पर झूठ ज्यादा हावी हो रहा है। आज झूठ बोलने वालों की जीत होती है और सच बोलने वालों की हार।

ऐसा इसलिए संभव हुआ है, क्योंकि मनुष्य छल-कपट, लोभ-लालचम में इतना अंधा हो चुका है कि उसे अपनी ग़लतियाँ दिखाई नहीं देती है।

जब मनुष्य को अपनी ग़लतियाँ दिखाई देती है, तब तक बहुत देर हो जाती हैं। इसलिए सत्य को हमेशा पहचानना चाहिए। सत्य हर मनुष्य के भीतर व्याप्त है, इसे समय-समय पर बाहर निकालना चाहिए। वरना 1 दिन असत्य सब को बर्बाद कर देता है।

अतिरिक्त प्रश्न. सत्य की पहचान हम कैसे करें? कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- सत्य प्रत्येक मनुष्य के अंदर विराजमान होता है, उसे ढूंढने के लिए इधर-उधर घूमने की जरूरत नहीं है। मनुष्य अगर अपने अंतर्मन की आवाज सुनेगा, तो उसे सत्य अवश्य मिल जाएगा।

सत्य कभी स्थिर नहीं रहता, उसे समय-समय पर उपयोग करने की आवश्यकता होती है। जहां गलत हो वहां सत्य बोलना चाहिए। जहां अधर्म हो वहां धर्म का साथ देकर सत्य को जिताना चाहिए।

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